Saturday, December 24, 2016
Saturday, December 17, 2016
गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं Garmi-e-hasrat-e-nakam se jal jate hain - Qateel Shifai
गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं
हम चरागों की तरह शाम से जल जाते हैं
बच निकलते हैं अगर अतीह-ए-सय्याद से हम
शोला-ए-आतिश-ए-गुलफाम से जल जाते हैं
खुदनुमाई तो नहीं शेवा-ए-अरबाब-ए-वफ़ा
जिन को जलना हो वो आराम से जल जाते हैं
शमा जिस आग में जलती है नुमाइश क लिए
हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं
जब भी आता है मेरा नाम तेरे नाम के साथ
जाने क्यूँ लोग मेरे नाम से जल जाते हैं
रब्ता बहम पे हमें क्या ना कहेंगे दुश्मन
आशना जब तेरे पैगाम से जल जाता है
- क़तील शिफ़ाई
बच निकलते हैं अगर अतीह-ए-सय्याद से हम
शोला-ए-आतिश-ए-गुलफाम से जल जाते हैं
खुदनुमाई तो नहीं शेवा-ए-अरबाब-ए-वफ़ा
जिन को जलना हो वो आराम से जल जाते हैं
शमा जिस आग में जलती है नुमाइश क लिए
हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं
जब भी आता है मेरा नाम तेरे नाम के साथ
जाने क्यूँ लोग मेरे नाम से जल जाते हैं
रब्ता बहम पे हमें क्या ना कहेंगे दुश्मन
आशना जब तेरे पैगाम से जल जाता है
- क़तील शिफ़ाई
Friday, December 16, 2016
Thursday, December 15, 2016
तुम जाओ हम से दूर तो एक काम कर जाना Tum jao hum se door to Ek kaam kar jana
तुम जाओ हम से दूर तो एक काम कर जाना
कुछ पल अपने हमारे नाम कर जाना
अगर आ जाए मौत हमें आप क आने से पहले
तो आ कर मेरे जनाज़े का एहतराम कर जाना
ना रोना इश क़दर कि
तकलीफ़ हो हमें
मौत को भी मज़ाक़ समझ कर अंजन बन जाना
मैं एक दिन सो जाऊं गा सदा क लिए
फिर मुझे बेवफा कह कर बदनाम कर जाना
जो गुज़रो मेरी क़बर से तो नज़रें न फेरना
अजनबी ही बन के दुआ सलाम कर जाना
मैं एक ढ़लती हुई शाम उसके नाम लिख रहा हूँ Main ek ḍhaltee hui shaam usake naam likh raha hoon
मैं एक ढ़लती हुई शाम उसके नाम लिख रहा हूँ।
एक प्यार भरे दिल का कत्लेआम लिख रहा हूँ।
एक प्यार भरे दिल का कत्लेआम लिख रहा हूँ।
ता उम्र मैं करता रहा जिस शाम उसका चर्चा,
मैं आज उसी शाम को नाकाम लिख रहा हूँ ।
सोचा था न जाऊँगा जहाँ उम्र भर कभी भी,
उस मैकदे में अब तो हर शाम दिख रहा हूँ ।
हाँसिल न हुआ जिसमें बस गम के शिवा कुछ भी,
मैं उस दीवानेपन का अंजाम लिख रहा हूँ ।
थी हीरे सी चमक मुझमें प्यार के उजाले में,
नफरत के अंधेरों में पथ्थर सा दिख रहा हूँ ।
दुनिया की निगाहों से जिसे था छुपाया करता,
उस बेवफा का नाम सरेआम लिख रहा हू ।
Friday, December 2, 2016
किसी की आँख में आँसू कहीं ठहरा हुआ होगा Kisi ki aankh mein aansoo kahin ṭhahara hua hoga
किसी की आँख में आँसू, कहीं ठहरा हुआ होगा
यकीनन दर्द का दरिया भी वहीँ सूखा हुआ होगा
जमाने की रवायत ने जुदा तुमसे किया मुझको
भरी दुनियाँ लुटी होगी, बड़ा सदमा हुआ होगा
धुँधले पड़े होंगे वो 'अक्स' जो कभी दिल में थे
वक्त की चोट से आईना-ए-दिल चटका हुआ होगा
बना तस्वीर यादों की, लिखे वो खून से गजलें
लिखे खत थे कभी उसने, उन्हें पढता हुआ होगा
कहीं मिल जाए भूले से, न पहचाने मुझे अब वो
उसकी याद का आँसू, कहीं गिरता हुआ होगा
जमाने की रवायत ने जुदा तुमसे किया मुझको
भरी दुनियाँ लुटी होगी, बड़ा सदमा हुआ होगा
धुँधले पड़े होंगे वो 'अक्स' जो कभी दिल में थे
वक्त की चोट से आईना-ए-दिल चटका हुआ होगा
बना तस्वीर यादों की, लिखे वो खून से गजलें
लिखे खत थे कभी उसने, उन्हें पढता हुआ होगा
कहीं मिल जाए भूले से, न पहचाने मुझे अब वो
उसकी याद का आँसू, कहीं गिरता हुआ होगा
Tuesday, November 29, 2016
कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो Kathin hai rahguzar thodi dur sath chalo
कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो।
बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी देर साथ चलो।
तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो।
नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो।
ये एक शब की मुलाक़ात भी गनीमत है
किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो।
तवाफ़-ए-मंज़िल-ए-जाना हमें भी करना है
‘फ़राज़’ तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो।
बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी देर साथ चलो।
तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो।
नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो।
ये एक शब की मुलाक़ात भी गनीमत है
किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो।
तवाफ़-ए-मंज़िल-ए-जाना हमें भी करना है
‘फ़राज़’ तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो।
- अहमद फ़राज़
Sunday, November 27, 2016
छोटी सी ज़िंदगी है हर बात में खुश रहो chhoti si zindagi hai har baat mein khus raho
छोटी सी ज़िंदगी है
हर बात में खुश रहो
जो चेहरा पास ना हो
उसकी आवाज में खुश रहो
कोई रूठा हो तुमसे
उसके इस अन्दाज में खुश रहो
जो लौट कर नहीं आने वाले
उन लम्हों की याद में खुश रहो
कल किसने देखा है
अपने आज में खुश रहो
खुशियों का इन्तजार किस लिए
दूसरों की मुस्कान में खुश रहो
क्यों तड़पते हो हर पल किसी के साथ को
कभी-कभी अपने आप में खुश रहो
छोटी सी तो ज़िंदगी है
हर हाल में खुश रहो
हर बात में खुश रहो
जो चेहरा पास ना हो
उसकी आवाज में खुश रहो
कोई रूठा हो तुमसे
उसके इस अन्दाज में खुश रहो
जो लौट कर नहीं आने वाले
उन लम्हों की याद में खुश रहो
कल किसने देखा है
अपने आज में खुश रहो
खुशियों का इन्तजार किस लिए
दूसरों की मुस्कान में खुश रहो
क्यों तड़पते हो हर पल किसी के साथ को
कभी-कभी अपने आप में खुश रहो
छोटी सी तो ज़िंदगी है
हर हाल में खुश रहो
Sunday, November 20, 2016
Tuesday, November 15, 2016
मार ही डाल मुझे चश्म-ए-अदा से पहले Maar hi Daal mujhe chasm-e-adaa se pahale
मार ही डाल मुझे चश्म-ए-अदा से पहले
अपनी मंजिल को पहुँच जाऊँगा कज़ा से पहले
इक नज़र देख लूं आ जाओ कज़ा से पहले
तुम से मिलने की तमन्ना है खुदा से पहले
हश्र के रोज़ मैं पूछूंगा खुदा से पहले
तूने रोका नहीं क्यों मुझको खता से पहले
ऐ मेरी मौत ठहर उनको जरा आने दे
जहर का जाम न दे मुझको दवा से पहले
हाथ पहुंचे भी न थे जुल्फ दोता तक मोमिन
हथकड़ी डाल दी ज़ालिम ने खता से पहले
- मोमिन ख़ाँ 'मोमिन'
___________________________________________
कज़ा=मौत; हश्र = क़यामत का दिन; दोता=मोड़
अपनी मंजिल को पहुँच जाऊँगा कज़ा से पहले
इक नज़र देख लूं आ जाओ कज़ा से पहले
तुम से मिलने की तमन्ना है खुदा से पहले
हश्र के रोज़ मैं पूछूंगा खुदा से पहले
तूने रोका नहीं क्यों मुझको खता से पहले
ऐ मेरी मौत ठहर उनको जरा आने दे
जहर का जाम न दे मुझको दवा से पहले
हाथ पहुंचे भी न थे जुल्फ दोता तक मोमिन
हथकड़ी डाल दी ज़ालिम ने खता से पहले
- मोमिन ख़ाँ 'मोमिन'
___________________________________________
कज़ा=मौत; हश्र = क़यामत का दिन; दोता=मोड़
Tuesday, January 10, 2012
तुम जानो, तुमको ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो Tum jaano tumko gair se jo rasm-o-raah ho
तुम जानो, तुमको ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो
मझको भी पूछते रहो तो क्या गुनाह हो
बचते नहीं मुवाखज़:-ए-रोज़े हश्र से
कातिल अगर रक़ीब है तो तुम गवाह हो
क्या वो: भी बेगुनह: कुश-ओ-हक़ ना शानस है?
माना के: तुम बशर नहीं, खुरशीद-ओ-माह हो
उभरा हुआ निक़ाब में है उनके एक तार
मरता हूँ मैं के: ये: न: किसी की निगाह हो
जब मैकद: छुटा तो फिर अब क्या जगह की कैद
मस्जिद हो, मदरस: हो, कोई खानकाह हो
सुनते हैं जो बहिश्त की तअरीफ़ सब दुरुस्त
लेकिन ख़ुदा करे वो: तेरा जल्व:गाह हो
'ग़ालिब' भी गर न: हो, तो कुछ ऐसा ज़रर नहीं
दुनिया हो यारब, और मेरा बादशाह हो
-मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ 'ग़ालिब'
____________________________________________________________________
रस्म-ओ-राह=सम्बन्ध; मुवाखज़:=उत्तरदायित्व; रोज़े हश्र=प्रलय का दिन; बेगुनह: कुश=निर्दोशियों
का वधक(मारने वाला); ओ=और; हक़ ना शानस=सत्य को न जानने वाला; बशर=मानव;
खुरशीद-ओ-माह=सूर्य, और चन्द्रमा; निक़ाब=नकाब; कैद=यहाँ कैद से अभिप्राय प्रतिबन्ध से है;
मैकद:=मदिरालय; मदरस:=मदरसा(पाठशाला); खानकाह=आश्रम; बहिश्त=स्वर्ग; तअरीफ़=प्रशंसा;
दुरुस्त=ठीक; जल्व:गाह=दृश्यस्थल; ज़रर=हानि(घाटा)
मझको भी पूछते रहो तो क्या गुनाह हो
बचते नहीं मुवाखज़:-ए-रोज़े हश्र से
कातिल अगर रक़ीब है तो तुम गवाह हो
क्या वो: भी बेगुनह: कुश-ओ-हक़ ना शानस है?
माना के: तुम बशर नहीं, खुरशीद-ओ-माह हो
उभरा हुआ निक़ाब में है उनके एक तार
मरता हूँ मैं के: ये: न: किसी की निगाह हो
जब मैकद: छुटा तो फिर अब क्या जगह की कैद
मस्जिद हो, मदरस: हो, कोई खानकाह हो
सुनते हैं जो बहिश्त की तअरीफ़ सब दुरुस्त
लेकिन ख़ुदा करे वो: तेरा जल्व:गाह हो
'ग़ालिब' भी गर न: हो, तो कुछ ऐसा ज़रर नहीं
दुनिया हो यारब, और मेरा बादशाह हो
-मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ 'ग़ालिब'
____________________________________________________________________
रस्म-ओ-राह=सम्बन्ध; मुवाखज़:=उत्तरदायित्व; रोज़े हश्र=प्रलय का दिन; बेगुनह: कुश=निर्दोशियों
का वधक(मारने वाला); ओ=और; हक़ ना शानस=सत्य को न जानने वाला; बशर=मानव;
खुरशीद-ओ-माह=सूर्य, और चन्द्रमा; निक़ाब=नकाब; कैद=यहाँ कैद से अभिप्राय प्रतिबन्ध से है;
मैकद:=मदिरालय; मदरस:=मदरसा(पाठशाला); खानकाह=आश्रम; बहिश्त=स्वर्ग; तअरीफ़=प्रशंसा;
दुरुस्त=ठीक; जल्व:गाह=दृश्यस्थल; ज़रर=हानि(घाटा)
Saturday, December 10, 2011
मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें Main unhen chhedoon aur kuchh na kahen-Mirza Ghalib
मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें
चल निकलते, जो मय पिए होते
क़हर हो, या बाला हो, जो कुछ हो
काश के तुम मेरे लिए जिए होते!
मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी या रब, कई दिए होते
आ ही जाता वो: रह पर 'ग़ालिब'!
कोई दिन और भी जिए होते
-मिर्ज़ा असद-उल्ला: खाँ 'ग़ालिब'
चल निकलते, जो मय पिए होते
क़हर हो, या बाला हो, जो कुछ हो
काश के तुम मेरे लिए जिए होते!
मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी या रब, कई दिए होते
आ ही जाता वो: रह पर 'ग़ालिब'!
कोई दिन और भी जिए होते
-मिर्ज़ा असद-उल्ला: खाँ 'ग़ालिब'
Monday, October 24, 2011
बाज़ीचः-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे Bazeecha e Atfal Hai Duniya Mere Aage - Mirza Ghalib
बाज़ीचः-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे
इक खेल है औरंगे-ए-सुलेमाँ मेरे नज़दीक
इक बात है एजाज़े मसीहा मेरे आगे
जुज़ नाम, नहीं सूरते आलम मुझे मंजूर
जुज़ वहम नहीं, हस्ति-ए-आशिया मेरे आगे
होता है निहाँ गर्द में सहरा, मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे: दरिया मेरे आगे
मत पूछ के क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख के: क्या रंग है तेरा मेरे आगे
सच कहते हो, खुदबीन-ओ-खुदआरा हूँ, न: क्यूँ हूँ ?
बैठा है बूते आईन: सीमा मेरे आगे
फिर देखिए अन्दाज़े गुलअफ्शानि-ए-गुफ़्तार
रखदे कोई पैमान:-ए-सहबा मेरे आगे
नफ़रत का गुमाँ गुज़रे है, मैं रश्क से गुज़रा
क्यूँकर कहूँ, लो नाम न: उनका मेरे आगे
ईमाँ मुझे रोक है, जो खेंचे है मुझे कुफ्र
कअब: मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे
आशिक़ हूँ, पे: माशूक फ़रेबी है मेरा काम
मजनूँ को बुरा कहती है लैला मेरे आगे
खुश होते हैं, पर वस्ल में यूँ मर नहीं जाते !
आई शबे हिजराँ की तमन्ना मेरे आगे
है मौजज़न इक कुल्जुमे खूँ, काश ! यही हो
आता है अभी देखिए क्या-क्या मेरे आगे
गो हाथ को जुंबिश नहीं, आखों में तो दम है
रहने दो अभी सगार-ओ-मीना मेरे आगे
हमपेश:-ओ-हम मशराब-ओ-हमराज़ है मेरा
'ग़ालिब' को बुरा क्यूँ कहो अच्छा मेरे आगे
-मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ 'ग़ालिब'
___________________________________________________________________________________
बाज़ीचः-ए-अत्फ़ाल=बच्चों के खेल का मैदान; शब-ओ-रोज़=दिन रात; औरंगे-ए-सुलेमाँ='सुलेमान' अवतार का सिंहासन; एजाज़े मसीहा=ईसा(jesus) का चमत्कार; जुज़(सिवा) नाम=नाम के अतिरिक्त;
सूरते आलम(संसार)=संसार रूप; जुज़ वहम=भ्रम के सिवा; हस्ति-ए-आशिया=वस्तुओं का अस्तित्व; निहाँ=गुप्त; गर्द=धूल; सहरा=जंगल; जबीं=माथा; ख़ाक=मिट्टी(धरती);
खुदबीन-ओ-खुदआरा=अभिमानता और खुद को अलंकृत करने वाला; बूते आईन:=प्रेमिका का आईन; सीमा=खास कर; अन्दाज़े गुलअफ्शानि-ए-गुफ़्तार =बातों से फूल बरसने के समान;
पैमान:-ए-सहबा=अंगूरों की शराब का प्याला; गुमाँ=संभावना; रश्क=ईर्ष्या; ईमाँ=धर्म; कुफ्र=अधर्म(पाप); कअब:=काबा(मुसलमानो का तीर्थ स्थल ); कलीसा=गिरजा(ईसाईयों का पूजा स्थल);
माशूक फ़रेबी=धोका देने वाला; वस्ल=मिलन; शबे हिजराँ=विरह की रात्रि; मौजज़न=लहरें मारने वाला; कुल्जुमे खूँ=खून का दरिया; जुंबिश=हिलना; सगार-ओ-मीना=जाम और सुराही;
हमपेश:=जो कार्य मैं करूँ वही दूसरा करे; ओ=और; हम मशराब=मेरे ही स्वभाव का;
हमराज़=यहाँ 'भेदी' से अभीप्रयाय है;
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे
इक खेल है औरंगे-ए-सुलेमाँ मेरे नज़दीक
इक बात है एजाज़े मसीहा मेरे आगे
जुज़ नाम, नहीं सूरते आलम मुझे मंजूर
जुज़ वहम नहीं, हस्ति-ए-आशिया मेरे आगे
होता है निहाँ गर्द में सहरा, मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे: दरिया मेरे आगे
मत पूछ के क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख के: क्या रंग है तेरा मेरे आगे
सच कहते हो, खुदबीन-ओ-खुदआरा हूँ, न: क्यूँ हूँ ?
बैठा है बूते आईन: सीमा मेरे आगे
फिर देखिए अन्दाज़े गुलअफ्शानि-ए-गुफ़्तार
रखदे कोई पैमान:-ए-सहबा मेरे आगे
नफ़रत का गुमाँ गुज़रे है, मैं रश्क से गुज़रा
क्यूँकर कहूँ, लो नाम न: उनका मेरे आगे
ईमाँ मुझे रोक है, जो खेंचे है मुझे कुफ्र
कअब: मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे
आशिक़ हूँ, पे: माशूक फ़रेबी है मेरा काम
मजनूँ को बुरा कहती है लैला मेरे आगे
खुश होते हैं, पर वस्ल में यूँ मर नहीं जाते !
आई शबे हिजराँ की तमन्ना मेरे आगे
है मौजज़न इक कुल्जुमे खूँ, काश ! यही हो
आता है अभी देखिए क्या-क्या मेरे आगे
गो हाथ को जुंबिश नहीं, आखों में तो दम है
रहने दो अभी सगार-ओ-मीना मेरे आगे
हमपेश:-ओ-हम मशराब-ओ-हमराज़ है मेरा
'ग़ालिब' को बुरा क्यूँ कहो अच्छा मेरे आगे
-मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ 'ग़ालिब'
___________________________________________________________________________________
बाज़ीचः-ए-अत्फ़ाल=बच्चों के खेल का मैदान; शब-ओ-रोज़=दिन रात; औरंगे-ए-सुलेमाँ='सुलेमान' अवतार का सिंहासन; एजाज़े मसीहा=ईसा(jesus) का चमत्कार; जुज़(सिवा) नाम=नाम के अतिरिक्त;
सूरते आलम(संसार)=संसार रूप; जुज़ वहम=भ्रम के सिवा; हस्ति-ए-आशिया=वस्तुओं का अस्तित्व; निहाँ=गुप्त; गर्द=धूल; सहरा=जंगल; जबीं=माथा; ख़ाक=मिट्टी(धरती);
खुदबीन-ओ-खुदआरा=अभिमानता और खुद को अलंकृत करने वाला; बूते आईन:=प्रेमिका का आईन; सीमा=खास कर; अन्दाज़े गुलअफ्शानि-ए-गुफ़्तार =बातों से फूल बरसने के समान;
पैमान:-ए-सहबा=अंगूरों की शराब का प्याला; गुमाँ=संभावना; रश्क=ईर्ष्या; ईमाँ=धर्म; कुफ्र=अधर्म(पाप); कअब:=काबा(मुसलमानो का तीर्थ स्थल ); कलीसा=गिरजा(ईसाईयों का पूजा स्थल);
माशूक फ़रेबी=धोका देने वाला; वस्ल=मिलन; शबे हिजराँ=विरह की रात्रि; मौजज़न=लहरें मारने वाला; कुल्जुमे खूँ=खून का दरिया; जुंबिश=हिलना; सगार-ओ-मीना=जाम और सुराही;
हमपेश:=जो कार्य मैं करूँ वही दूसरा करे; ओ=और; हम मशराब=मेरे ही स्वभाव का;
हमराज़=यहाँ 'भेदी' से अभीप्रयाय है;
Monday, October 10, 2011
ज़िक्र उस परीवश का, और फिर बयाँ अपना Jikra us parivash ka aur fir bayaan apna
ज़िक्र उस परीवश का, और फिर बयाँ अपना
बन गया रक़ीब आखिर, था जो राज़दाँ अपना
मय वो: क्यूँ बहुत पीते बज़्मे ग़ैर में यारब !
आज ही हुआ मंजूर उन को इम्तिहाँ अपना
मंज़र इक बुलन्दी पर और हम बना सकते
अर्श से इधर होता काश के मकाँ अपना
दे वो: जिस क़दर ज़िल्लत, हम हँसी में टालेंगे
बारे आशना निकला उनका पासबाँ, अपना
दर्दे दिल लिखूँ कब तक, जाऊँ उनको दिखला दूँ
उंगलियाँ फ़िगार अपनी, खाम: खूँ चकाँ अपना
घिसते घिसते मिट जाता, आपने अबस बदला
नंगे सिज्द: से मेरे, संगे आस्ताँ अपना
ता करे न गम्माज़ी , कर लिया है दुश्मन को
दोस्त की शिकायत में हमने हमज़बाँ अपना
हम कहाँ के दाना थे, किस हुनर में यक्ता थे
बेसबब हुआ ‘ग़ालिब’ ! दुश्मन आसमाँ अपना
-मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ 'ग़ालिब'
_________________________________________________________________________
परीवश=सुन्दरी; रक़ीब=प्रतिद्वंदी(दुसमन); राज़दाँ=भेद जानने वाला; मय=शराब; बज़्मे=गोष्ठी(महफ़िल);
अर्श=आकास; ज़िल्लत=अपमान; पासबाँ=द्वारपाल(gatekeeper); फ़िगार=घायल; खाम: खूँ चकाँ=खून से
भरा कलम; अबस=व्यर्थ; नंगे सिज्द:=माथे का वह चिन्ह जो सजदः(सजदा)करते करते पड़ जाता है;
संगे आस्ताँ=चौखट का पत्थर; गम्माज़ी=चुगली; हमज़बाँ=अपनी जैसी जुबान वाला,(यहाँ "समर्थक" से अभिप्राय है )
दाना=बुद्धिमान; यक्ता=अद्वितीय(जिसके सामान दुनिया में कोई दूसरा न हो)
बन गया रक़ीब आखिर, था जो राज़दाँ अपना
मय वो: क्यूँ बहुत पीते बज़्मे ग़ैर में यारब !
आज ही हुआ मंजूर उन को इम्तिहाँ अपना
मंज़र इक बुलन्दी पर और हम बना सकते
अर्श से इधर होता काश के मकाँ अपना
दे वो: जिस क़दर ज़िल्लत, हम हँसी में टालेंगे
बारे आशना निकला उनका पासबाँ, अपना
दर्दे दिल लिखूँ कब तक, जाऊँ उनको दिखला दूँ
उंगलियाँ फ़िगार अपनी, खाम: खूँ चकाँ अपना
घिसते घिसते मिट जाता, आपने अबस बदला
नंगे सिज्द: से मेरे, संगे आस्ताँ अपना
ता करे न गम्माज़ी , कर लिया है दुश्मन को
दोस्त की शिकायत में हमने हमज़बाँ अपना
हम कहाँ के दाना थे, किस हुनर में यक्ता थे
बेसबब हुआ ‘ग़ालिब’ ! दुश्मन आसमाँ अपना
-मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ 'ग़ालिब'
_________________________________________________________________________
परीवश=सुन्दरी; रक़ीब=प्रतिद्वंदी(दुसमन); राज़दाँ=भेद जानने वाला; मय=शराब; बज़्मे=गोष्ठी(महफ़िल);
अर्श=आकास; ज़िल्लत=अपमान; पासबाँ=द्वारपाल(gatekeeper); फ़िगार=घायल; खाम: खूँ चकाँ=खून से
भरा कलम; अबस=व्यर्थ; नंगे सिज्द:=माथे का वह चिन्ह जो सजदः(सजदा)करते करते पड़ जाता है;
संगे आस्ताँ=चौखट का पत्थर; गम्माज़ी=चुगली; हमज़बाँ=अपनी जैसी जुबान वाला,(यहाँ "समर्थक" से अभिप्राय है )
दाना=बुद्धिमान; यक्ता=अद्वितीय(जिसके सामान दुनिया में कोई दूसरा न हो)
Sunday, August 14, 2011
ख़िरद मन्दो से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है Khirad mando se kya poochhoon ki meri ibtida kya hai.
ख़िरद मन्दो से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है
कि मैं इस फिक्र में रहता हूँ मेरी इन्तहा क्या है
खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रिज़ा क्या है
नज़र आई मुझे तक़दीर की गहराइयाँ इसमें
न पूछ ऐ हमनशी मुझसे वो चश्मे-सुर्मा-सा क्या है
नवाए-सुबह गाही ने जिगर खूँ कर दिया मेरा
खुदाया जिस खता की यह सज़ा है वो खता क्या है
- अल्लामा मुहम्मद 'इक़बाल'
_____________________________________________________
ख़िरद=ज्ञानी ; इब्तिदा=आरंभ ; इन्तहा=अंत ; रिज़ा=भाग्य ; हमनशी=इच्छा ;
चश्मे-सुर्मा=आँख का सुर्मा ; नवाए-सुबह=सुबह की आवाजें ;
कि मैं इस फिक्र में रहता हूँ मेरी इन्तहा क्या है
खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रिज़ा क्या है
नज़र आई मुझे तक़दीर की गहराइयाँ इसमें
न पूछ ऐ हमनशी मुझसे वो चश्मे-सुर्मा-सा क्या है
नवाए-सुबह गाही ने जिगर खूँ कर दिया मेरा
खुदाया जिस खता की यह सज़ा है वो खता क्या है
- अल्लामा मुहम्मद 'इक़बाल'
_____________________________________________________
ख़िरद=ज्ञानी ; इब्तिदा=आरंभ ; इन्तहा=अंत ; रिज़ा=भाग्य ; हमनशी=इच्छा ;
चश्मे-सुर्मा=आँख का सुर्मा ; नवाए-सुबह=सुबह की आवाजें ;
Friday, July 29, 2011
Sunday, July 3, 2011
हैराँ हूँ दिल को रोऊँ, के: पीटूँ जिगर को मैं ? HairaaN hoon dil ko ro'oon ki peetoon jigar ko main
हैराँ हूँ दिल को रोऊँ, के: पीटूँ जिगर को मैं
मक़दूर हो तो साथ रखूँ नोह: गार को मैं
छोड़ा न: रश्क ने के: तेरे घर का नाम लूँ
हर यक से पूछता हूँ के: जाऊँ किधर को मैं ?
जाना पड़ा रक़ीब के दर पर हज़ार बार
ए काश ! जानता न: तेरे रहगुज़र को मैं
है क्या जो कस के बाँधिए, मेरी बाला डरे
क्या जनता नहीं हूँ तुम्हारी कमर को मैं
लो वो: भी कहते हैं के: ये: बे नंग-ओ-नाम है
ये: जानता अगर, तो लुटाता न: घर को मैं
चलता हूँ थोड़ी दूर हर इक तेज़रौ के साथ
पहचानता नहीं हूँ अभी राहबर को मैं
ख़्वाहिश को अहमक़ों ने परस्तिश दिया क़रार
क्या पूजता हूँ उस बूते बेदादगर को मैं ?
फिर बेखुदी में भूल गया राहे कू-ए-यार
जाता वगर्न: एक दिन अपनी ख़बर को मैं
अपने पे: कर रहा हूँ कियास अहले दहर का
समझा हूँ दिल पज़ीर मताअ-ए-हुनर को मैं
ग़ालिब ! खुदा करे के: सवारे समन्दे नाज़
देखूँ अली बहादुरे आली गुहर को मैं
- मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ 'ग़ालिब'
________________________________________________________________________
मक़दूर=सामर्थ्य; नोह: गार=मातम करने वाला; रश्क=इर्ष्या; रक़ीब=प्रतिद्वंदी(दुसमन); रहगुज़र=मार्ग;
बे नंग-ओ-नाम=बद चलन; तेज़रौ=तीव्रगामी(तेज़ चलने वाली); राहबर=मार्ग दर्शक; परस्तिश=पूजना;
बूते बेदादगर=मस्ती; राहे कू-ए-यार=प्रेमी की गली का मार्ग; कियास=अनुमान; अहले दहर=दुनिया वाले;
दिल पज़ीर=मनोवांछित(मन मुताबित); मताअ-ए-हुनर=कला की सम्पत्ति; सवारे समन्दे नाज़=गर्व के
घोड़े पे सवार; अली बहादुरे=ग़ालिब का मित्र; आली गुहर=अधिक मूल्यवान;
मक़दूर हो तो साथ रखूँ नोह: गार को मैं
छोड़ा न: रश्क ने के: तेरे घर का नाम लूँ
हर यक से पूछता हूँ के: जाऊँ किधर को मैं ?
जाना पड़ा रक़ीब के दर पर हज़ार बार
ए काश ! जानता न: तेरे रहगुज़र को मैं
है क्या जो कस के बाँधिए, मेरी बाला डरे
क्या जनता नहीं हूँ तुम्हारी कमर को मैं
लो वो: भी कहते हैं के: ये: बे नंग-ओ-नाम है
ये: जानता अगर, तो लुटाता न: घर को मैं
चलता हूँ थोड़ी दूर हर इक तेज़रौ के साथ
पहचानता नहीं हूँ अभी राहबर को मैं
ख़्वाहिश को अहमक़ों ने परस्तिश दिया क़रार
क्या पूजता हूँ उस बूते बेदादगर को मैं ?
फिर बेखुदी में भूल गया राहे कू-ए-यार
जाता वगर्न: एक दिन अपनी ख़बर को मैं
अपने पे: कर रहा हूँ कियास अहले दहर का
समझा हूँ दिल पज़ीर मताअ-ए-हुनर को मैं
ग़ालिब ! खुदा करे के: सवारे समन्दे नाज़
देखूँ अली बहादुरे आली गुहर को मैं
- मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ 'ग़ालिब'
________________________________________________________________________
मक़दूर=सामर्थ्य; नोह: गार=मातम करने वाला; रश्क=इर्ष्या; रक़ीब=प्रतिद्वंदी(दुसमन); रहगुज़र=मार्ग;
बे नंग-ओ-नाम=बद चलन; तेज़रौ=तीव्रगामी(तेज़ चलने वाली); राहबर=मार्ग दर्शक; परस्तिश=पूजना;
बूते बेदादगर=मस्ती; राहे कू-ए-यार=प्रेमी की गली का मार्ग; कियास=अनुमान; अहले दहर=दुनिया वाले;
दिल पज़ीर=मनोवांछित(मन मुताबित); मताअ-ए-हुनर=कला की सम्पत्ति; सवारे समन्दे नाज़=गर्व के
घोड़े पे सवार; अली बहादुरे=ग़ालिब का मित्र; आली गुहर=अधिक मूल्यवान;
Tuesday, June 28, 2011
ये: न: थी हमारी क़िस्मत के विसाले यार होता Ye na thi hamari kismat ke visale yaar hota-Galib
ये: न: थी हमारी क़िस्मत के विसाले यार होता
अगर और जीते रहते , यही इंतज़ार होता
तेरे वादे पर जिए हम , तो ये:, जान झूठ जाना
के ख़ुशी से मर न: जाते, अगर एतिबार होता
तेरी नाजुकी से जाना के: बँधा था अहद बोदा
कभी तू न: तोड़ सकता, अगर उस्तवार होता
कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीरे नीमकश को
ये ख़लिश कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता
ये: कहाँ की दोस्ती है के: बने हैं दोस्त, नासेह
कोई चारासाज़ होता, कोई ग़मगुसार होता
रगे संग से टपकता वो: लहू के: फिर न: थमता
जिसे ग़म समझ रहे हो, ये: अगर शरार होता
गम अगर्चे जाँगुसिल है, पे: कहाँ बचें के: दिल है
गमे इश्क गर न होता, गमे रोज़गार होता
कहूँ किससे मैं के: क्या है, शबे ग़म बुरी बाला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता
हुए मर के: हम जो रुस्वा, हुए क्यूँ न: गर्के दरिया
न: कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता
उसे कौन देख सकता के:, यागन: है वो: यक्ता
जो दुई की बू भी होती, तो कहीं दुचार होता
ये: मसाइले तसव्वुफ़ , ये तेरा बयान, ग़ालिब !
तुझे हम वली समझते, जो न: बादः ख्वार होता
-मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ 'ग़ालिब'
_________________________________________________________________________
विसाले=मिलन ; अहद बोदा=कच्ची प्रतिज्ञा ; उस्तवार=पक्का ; तीरे नीमकश=अध खींचा हुआ तीर ;
ख़लिश=चुभन ; नासेह=एक या बहुत से आदमी ; चारासाज़=उपचारक ; ग़मगुसार=दुःख का साथी ; रगे संग=पत्थर की नस ; शरार=चिंगारी ; अगर्चे=यधपि,गोकि ; जाँगुसिल=कष्टदायक ;
गमे इश्क=प्रेम का संताप ; गमे रोज़गार=संसार की चिन्ता ; शबे ग़म=रात्रि का विरह(विरह=जुदाई का दर्द);
रुस्वा=बदनाम ; गर्के दरिया=दरिया में डूबना ; यागन:=अलग ; यक्ता=अकेला ; दुई=झगड़ा ;
दुचार=सामने आना ; मसाइले तसव्वुफ़=ब्रहमवाद की समस्याएं ; बादः ख्वार=शराबी ;
अगर और जीते रहते , यही इंतज़ार होता
तेरे वादे पर जिए हम , तो ये:, जान झूठ जाना
के ख़ुशी से मर न: जाते, अगर एतिबार होता
तेरी नाजुकी से जाना के: बँधा था अहद बोदा
कभी तू न: तोड़ सकता, अगर उस्तवार होता
कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीरे नीमकश को
ये ख़लिश कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता
ये: कहाँ की दोस्ती है के: बने हैं दोस्त, नासेह
कोई चारासाज़ होता, कोई ग़मगुसार होता
रगे संग से टपकता वो: लहू के: फिर न: थमता
जिसे ग़म समझ रहे हो, ये: अगर शरार होता
गम अगर्चे जाँगुसिल है, पे: कहाँ बचें के: दिल है
गमे इश्क गर न होता, गमे रोज़गार होता
कहूँ किससे मैं के: क्या है, शबे ग़म बुरी बाला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता
हुए मर के: हम जो रुस्वा, हुए क्यूँ न: गर्के दरिया
न: कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता
उसे कौन देख सकता के:, यागन: है वो: यक्ता
जो दुई की बू भी होती, तो कहीं दुचार होता
ये: मसाइले तसव्वुफ़ , ये तेरा बयान, ग़ालिब !
तुझे हम वली समझते, जो न: बादः ख्वार होता
-मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ 'ग़ालिब'
_________________________________________________________________________
विसाले=मिलन ; अहद बोदा=कच्ची प्रतिज्ञा ; उस्तवार=पक्का ; तीरे नीमकश=अध खींचा हुआ तीर ;
ख़लिश=चुभन ; नासेह=एक या बहुत से आदमी ; चारासाज़=उपचारक ; ग़मगुसार=दुःख का साथी ; रगे संग=पत्थर की नस ; शरार=चिंगारी ; अगर्चे=यधपि,गोकि ; जाँगुसिल=कष्टदायक ;
गमे इश्क=प्रेम का संताप ; गमे रोज़गार=संसार की चिन्ता ; शबे ग़म=रात्रि का विरह(विरह=जुदाई का दर्द);
रुस्वा=बदनाम ; गर्के दरिया=दरिया में डूबना ; यागन:=अलग ; यक्ता=अकेला ; दुई=झगड़ा ;
दुचार=सामने आना ; मसाइले तसव्वुफ़=ब्रहमवाद की समस्याएं ; बादः ख्वार=शराबी ;
Saturday, June 4, 2011
अजब नशात से, जल्लाद के चले हैं हम आगे Ajab nashat se jallad ke chale hain hum aage-Galib
अजब नशात से, जल्लाद के चले हैं हम आगे
के: अपने साये से सर, पाँव से है दो कदम आगे
कज़ा ने था मुझे चाहा ख़राबे बादः-ए-उल्फ़त
फ़क़त 'ख़राब' लिखा, बस नः चल सका कलम आगे
ग़मे ज़मानः ने झाड़ी नाश्ते इश्क़ की मस्ती
वगर्न: हम भी उठाते थे लज्ज़ते अलम आगे
खुदा के वास्ते दाद इस जुनूने शौक़ की देना
के उसके दर पे: पहोंचते हैं नामःबार से हम आगे
ये: उम्र भर जो परीशानियाँ उठाई हैं हमने
तुम्हारे आइयो ऐ तुर्र: हाए ख़म बः ख़म, आगे
दिल-ओ-जिगर में परअफशाँ जो एक मौज:-ए-खूँ है
हम अपने ज़ओम में समझे हुए थे उसको दम आगे
क़सम जनाज़े पे: आने की मेरे खाते हैं 'ग़ालिब'
हमेशा: खाते थे जो मेरी जान की क़सम, आगे
-मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ 'ग़ालिब'
_____________________________________________________________________________
नशात=हर्ष; कज़ा=मौत; ख़राबे बादः-ए-उल्फ़त=मदिरा की चाहत मे नष्ट; ग़मे ज़मानः=दुनिया के दुःख;
नाश्ते इश्क़=प्रेम का हर्ष (खुसी); लज्ज़ते अलम=दुखों का आनंद; नामःबार=डाकिया;
तुर्र: हाए ख़म बः ख़म=घूँघरियली बालों की लटें; परअफशाँ=व्याकुल (बेचैन);
मौज:-ए-खूँ=खून की लहर; ज़ओम=घमंड; दम=सांस;
के: अपने साये से सर, पाँव से है दो कदम आगे
कज़ा ने था मुझे चाहा ख़राबे बादः-ए-उल्फ़त
फ़क़त 'ख़राब' लिखा, बस नः चल सका कलम आगे
ग़मे ज़मानः ने झाड़ी नाश्ते इश्क़ की मस्ती
वगर्न: हम भी उठाते थे लज्ज़ते अलम आगे
खुदा के वास्ते दाद इस जुनूने शौक़ की देना
के उसके दर पे: पहोंचते हैं नामःबार से हम आगे
ये: उम्र भर जो परीशानियाँ उठाई हैं हमने
तुम्हारे आइयो ऐ तुर्र: हाए ख़म बः ख़म, आगे
दिल-ओ-जिगर में परअफशाँ जो एक मौज:-ए-खूँ है
हम अपने ज़ओम में समझे हुए थे उसको दम आगे
क़सम जनाज़े पे: आने की मेरे खाते हैं 'ग़ालिब'
हमेशा: खाते थे जो मेरी जान की क़सम, आगे
-मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ 'ग़ालिब'
_____________________________________________________________________________
नशात=हर्ष; कज़ा=मौत; ख़राबे बादः-ए-उल्फ़त=मदिरा की चाहत मे नष्ट; ग़मे ज़मानः=दुनिया के दुःख;
नाश्ते इश्क़=प्रेम का हर्ष (खुसी); लज्ज़ते अलम=दुखों का आनंद; नामःबार=डाकिया;
तुर्र: हाए ख़म बः ख़म=घूँघरियली बालों की लटें; परअफशाँ=व्याकुल (बेचैन);
मौज:-ए-खूँ=खून की लहर; ज़ओम=घमंड; दम=सांस;
Sunday, May 22, 2011
हुई ताखीर, तो कुछ बाइसे ताखीर भी था Hui takhir, Toh kuch baaise takhir bhi tha
हुई ताखीर, तो कुछ बाइसे ताखीर भी था
आप आते थे, मगर कोई इनाँगीर भी था
तुमसे बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला
उससे कुछ शाइब-ए-खूबी-ए-तकदीर भी था
तू मुझे भूल गया हो तो पता बतला दूं
कभी फ़ितराक में तेरे कोई नख्चीर भी था ?
कैद में है तेरे वहशी की वोही जुल्फ की याद
हाँ कुछ इक रंजे गराँ बारि-ए-जंजीर भी था
बिजली कोंद गई आँखों के आगे, तो क्या
बात करते, के: मैं लब तश्न:-ए-तक़रीर भी था
युसूफ उसको कहूँ और कुछ न: कहे, ख़ैर हुई
गर बिगड़ बैठे, तो मैं लायक़े तअज़ीर भी था
देखकर गैर, क्यों हो न: कलेजा ठंडा
नाल: करता था, वले तालिबे तासीर भी था
पेशे में ऐब नहीं, रखिए नः 'फरहाद' को नाम
हम ही आशुफ़्ता सरों में वोः जवाँ 'मीर' भी था
हम थे मरने को खड़े, पास नः आया, नः सही
आख़िर उस शोख़ के तरकश में कोई तीर भी था
पकडे जातें हैं फ़रिश्तों के लिखे पर नाहक
आदमी कोई हमारा दमे तहरीर भी था ?
रेख्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'
कहतें हैं, अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था
-मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ 'ग़ालिब'
________________________________________________________________________
ताखीर=ढील,देर; बाइसे=कारण; बेजा=बिना कारण; शाइब=मिलावट,शक; खूबी-ए-तकदी=सौभाग्य;
फ़ितराक=शिकारी का थैला; नख्चीर=शिकार किया हुआ जानवर; वहशी=पागल; बारि-ए-जंजीर=जंजीर
के बोझ का कष्ट; कोंद=चमक देना; तश्न:-ए-तक़रीर=प्यासे होटों की आवाज; युसूफ=एक अवतार का
नाम जो अपनी सुन्दरता में प्रसिद्ध थे(यहाँ प्रेमी लिया गया है); तअज़ीर=सजा के योग्य; नाल:=रुदन(रोना)
तासीर=प्रभाव; सरों=दीवानों,पागलों; मीर=ग़ालिब से पूर्व एक प्रसिद्ध शायर का नाम; सोख़=चंचल;
आप आते थे, मगर कोई इनाँगीर भी था
तुमसे बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला
उससे कुछ शाइब-ए-खूबी-ए-तकदीर भी था
तू मुझे भूल गया हो तो पता बतला दूं
कभी फ़ितराक में तेरे कोई नख्चीर भी था ?
कैद में है तेरे वहशी की वोही जुल्फ की याद
हाँ कुछ इक रंजे गराँ बारि-ए-जंजीर भी था
बिजली कोंद गई आँखों के आगे, तो क्या
बात करते, के: मैं लब तश्न:-ए-तक़रीर भी था
युसूफ उसको कहूँ और कुछ न: कहे, ख़ैर हुई
गर बिगड़ बैठे, तो मैं लायक़े तअज़ीर भी था
देखकर गैर, क्यों हो न: कलेजा ठंडा
नाल: करता था, वले तालिबे तासीर भी था
पेशे में ऐब नहीं, रखिए नः 'फरहाद' को नाम
हम ही आशुफ़्ता सरों में वोः जवाँ 'मीर' भी था
हम थे मरने को खड़े, पास नः आया, नः सही
आख़िर उस शोख़ के तरकश में कोई तीर भी था
पकडे जातें हैं फ़रिश्तों के लिखे पर नाहक
आदमी कोई हमारा दमे तहरीर भी था ?
रेख्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'
कहतें हैं, अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था
-मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ 'ग़ालिब'
________________________________________________________________________
ताखीर=ढील,देर; बाइसे=कारण; बेजा=बिना कारण; शाइब=मिलावट,शक; खूबी-ए-तकदी=सौभाग्य;
फ़ितराक=शिकारी का थैला; नख्चीर=शिकार किया हुआ जानवर; वहशी=पागल; बारि-ए-जंजीर=जंजीर
के बोझ का कष्ट; कोंद=चमक देना; तश्न:-ए-तक़रीर=प्यासे होटों की आवाज; युसूफ=एक अवतार का
नाम जो अपनी सुन्दरता में प्रसिद्ध थे(यहाँ प्रेमी लिया गया है); तअज़ीर=सजा के योग्य; नाल:=रुदन(रोना)
तासीर=प्रभाव; सरों=दीवानों,पागलों; मीर=ग़ालिब से पूर्व एक प्रसिद्ध शायर का नाम; सोख़=चंचल;












