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Friday, December 16, 2016

ना था कुछ तो खुदा था, कुछ ना होता तो खुदा होता Na tha kuch to khuda tha, kuch na hota to khuda hota – Mirza Ghalib

Na tha kuch to khuda tha kuch na hota to khuda hota – Mirza Ghalib

ना था कुछ तो खुदा था, कुछ ना होता तो खुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने, ना होता मैं तो क्या होता

हुआ जब गम से यूँ बेहीस तो गम क्या सर के काटने का
ना होता गर जुदा तन से तो जानूँ पर धारा होता

हुई मुद्दत के 'ग़ालिबमर गया पर याद आता है
वो हर एक बात पे कहना के यूँ होता तो क्या होता

                 
                                                     - मिर्ज़ा ग़ालिब


Tuesday, January 10, 2012

तुम जानो, तुमको ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो Tum jaano tumko gair se jo rasm-o-raah ho

तुम  जानो, तुमको  ग़ैर   से  जो  रस्म-ओ-राह  हो
मझको  भी  पूछते  रहो  तो  क्या  गुनाह  हो

बचते  नहीं  मुवाखज़:-ए-रोज़े  हश्र  से
कातिल  अगर  रक़ीब  है  तो  तुम  गवाह  हो

क्या  वो: भी  बेगुनह:  कुश-ओ-हक़  ना  शानस  है?
माना  के: तुम  बशर  नहीं,  खुरशीद-ओ-माह  हो

उभरा  हुआ  निक़ाब  में  है  उनके  एक  तार
मरता  हूँ  मैं  के:  ये:  न:  किसी  की  निगाह  हो

जब  मैकद:  छुटा  तो  फिर अब  क्या  जगह  की  कैद
मस्जिद  हो,  मदरस:  हो,  कोई  खानकाह  हो

सुनते  हैं  जो  बहिश्त  की  तअरीफ़  सब  दुरुस्त
लेकिन  ख़ुदा  करे  वो:  तेरा  जल्व:गाह  हो

'ग़ालिब'  भी  गर  न: हो, तो  कुछ  ऐसा  ज़रर  नहीं
दुनिया  हो  यारब,  और  मेरा  बादशाह  हो

                                         -मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ 'ग़ालिब'
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रस्म-ओ-राह=सम्बन्ध; मुवाखज़:=उत्तरदायित्व; रोज़े  हश्र=प्रलय का दिन; बेगुनह:  कुश=निर्दोशियों
का वधक(मारने वाला); ओ=और; हक़  ना  शानस=सत्य को न जानने वाला; बशर=मानव;
खुरशीद-ओ-माह=सूर्य, और चन्द्रमा; निक़ाब=नकाब; कैद=यहाँ कैद से अभिप्राय प्रतिबन्ध से है;
मैकद:=मदिरालय; मदरस:=मदरसा(पाठशाला); खानकाह=आश्रम; बहिश्त=स्वर्ग; तअरीफ़=प्रशंसा;
दुरुस्त=ठीक; जल्व:गाह=दृश्यस्थल; ज़रर=हानि(घाटा)

Saturday, December 10, 2011

मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें Main unhen chhedoon aur kuchh na kahen-Mirza Ghalib

मैं  उन्हें  छेड़ूँ  और  कुछ  न  कहें
चल  निकलते, जो मय पिए होते

क़हर हो, या बाला हो, जो कुछ हो
काश के तुम मेरे लिए जिए होते!

मेरी क़िस्मत में  ग़म  गर इतना था
दिल भी या रब, कई  दिए  होते

आ ही जाता वो: रह  पर 'ग़ालिब'!
कोई   दिन और  भी  जिए  होते
                                       -मिर्ज़ा असद-उल्ला: खाँ 'ग़ालिब'

Monday, October 24, 2011

बाज़ीचः-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे Bazeecha e Atfal Hai Duniya Mere Aage - Mirza Ghalib

बाज़ीचः-ए-अत्फ़ाल  है दुनिया मेरे आगे
होता है  शब-ओ-रोज़  तमाशा मेरे आगे

इक खेल है औरंगे-ए-सुलेमाँ मेरे नज़दीक
इक बात है  एजाज़े मसीहा मेरे आगे

जुज़ नाम, नहीं सूरते आलम मुझे मंजूर
जुज़ वहम  नहीं, हस्ति-ए-आशिया मेरे आगे

होता है निहाँ  गर्द में सहरा, मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे: दरिया मेरे आगे

मत पूछ के क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू  देख  के: क्या रंग  है तेरा मेरे आगे

सच कहते  हो, खुदबीन-ओ-खुदआरा  हूँ, न: क्यूँ हूँ ?
बैठा  है  बूते  आईन:  सीमा  मेरे  आगे

फिर  देखिए अन्दाज़े  गुलअफ्शानि-ए-गुफ़्तार
रखदे  कोई  पैमान:-ए-सहबा  मेरे  आगे

नफ़रत  का  गुमाँ  गुज़रे  है,  मैं रश्क से गुज़रा
क्यूँकर कहूँ, लो नाम  न: उनका  मेरे आगे

ईमाँ  मुझे  रोक है, जो खेंचे  है  मुझे कुफ्र
कअब:  मेरे  पीछे है कलीसा मेरे आगे

आशिक़ हूँ, पे: माशूक फ़रेबी है मेरा काम
मजनूँ  को  बुरा  कहती  है लैला मेरे आगे

खुश  होते  हैं, पर  वस्ल में यूँ  मर  नहीं  जाते !
आई  शबे  हिजराँ  की  तमन्ना  मेरे  आगे

है  मौजज़न  इक कुल्जुमे खूँ, काश ! यही हो
आता  है  अभी देखिए  क्या-क्या मेरे आगे

गो  हाथ  को  जुंबिश  नहीं, आखों में तो दम है
रहने  दो अभी  सगार-ओ-मीना  मेरे  आगे

हमपेश:-ओ-हम  मशराब-ओ-हमराज़  है  मेरा
'ग़ालिब' को बुरा क्यूँ  कहो अच्छा  मेरे आगे
                                                         -मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ  'ग़ालिब'

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बाज़ीचः-ए-अत्फ़ाल=बच्चों के खेल का मैदान;  शब-ओ-रोज़=दिन रात;  औरंगे-ए-सुलेमाँ='सुलेमान' अवतार का सिंहासन; एजाज़े मसीहा=ईसा(jesus) का चमत्कार;  जुज़(सिवा) नाम=नाम के अतिरिक्त;
सूरते आलम(संसार)=संसार रूप;  जुज़ वहम=भ्रम के सिवा;  हस्ति-ए-आशिया=वस्तुओं का अस्तित्व; निहाँ=गुप्त; गर्द=धूल; सहरा=जंगल; जबीं=माथा; ख़ाक=मिट्टी(धरती);
खुदबीन-ओ-खुदआरा=अभिमानता और खुद को अलंकृत करने वाला;  बूते  आईन:=प्रेमिका का आईन; सीमा=खास कर;  अन्दाज़े  गुलअफ्शानि-ए-गुफ़्तार =बातों से फूल बरसने के समान;
पैमान:-ए-सहबा=अंगूरों की शराब का प्याला;   गुमाँ=संभावना; रश्क=ईर्ष्या; ईमाँ=धर्म; कुफ्र=अधर्म(पाप); कअब:=काबा(मुसलमानो का तीर्थ स्थल );  कलीसा=गिरजा(ईसाईयों का पूजा स्थल);
माशूक फ़रेबी=धोका देने वाला;  वस्ल=मिलन; शबे  हिजराँ=विरह की रात्रि; मौजज़न=लहरें मारने वाला; कुल्जुमे खूँ=खून का दरिया;  जुंबिश=हिलना;  सगार-ओ-मीना=जाम और सुराही;
हमपेश:=जो कार्य मैं करूँ वही दूसरा करे; ओ=और;  हम  मशराब=मेरे ही स्वभाव का;
हमराज़=यहाँ  'भेदी' से अभीप्रयाय है;

Monday, October 10, 2011

ज़िक्र उस परीवश का, और फिर बयाँ अपना Jikra us parivash ka aur fir bayaan apna

ज़िक्र  उस  परीवश  का, और  फिर  बयाँ  अपना
बन  गया  रक़ीब  आखिर,  था  जो  राज़दाँ  अपना

मय  वो:  क्यूँ  बहुत  पीते  बज़्मे  ग़ैर  में  यारब !
आज  ही  हुआ  मंजूर  उन  को  इम्तिहाँ  अपना

मंज़र  इक  बुलन्दी  पर  और  हम  बना  सकते
अर्श  से  इधर  होता  काश  के  मकाँ  अपना

दे  वो: जिस  क़दर  ज़िल्लत,  हम  हँसी  में  टालेंगे
बारे  आशना  निकला  उनका  पासबाँ,  अपना

दर्दे  दिल  लिखूँ  कब  तक, जाऊँ  उनको  दिखला  दूँ
उंगलियाँ  फ़िगार  अपनी,  खाम: खूँ  चकाँ  अपना

घिसते  घिसते  मिट  जाता,  आपने  अबस  बदला
नंगे  सिज्द:  से  मेरे,  संगे  आस्ताँ  अपना

ता  करे  न  गम्माज़ी , कर  लिया  है  दुश्मन  को
दोस्त  की   शिकायत  में  हमने  हमज़बाँ  अपना

हम  कहाँ  के  दाना  थे,  किस  हुनर  में  यक्ता  थे
बेसबब  हुआ ‘ग़ालिब’ ! दुश्मन  आसमाँ  अपना
                                                           -मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ  'ग़ालिब'
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परीवश=सुन्दरी; रक़ीब=प्रतिद्वंदी(दुसमन);  राज़दाँ=भेद जानने  वाला; मय=शराब;  बज़्मे=गोष्ठी(महफ़िल);
अर्श=आकास; ज़िल्लत=अपमान;  पासबाँ=द्वारपाल(gatekeeper); फ़िगार=घायल; खाम: खूँ  चकाँ=खून से
भरा कलम; अबस=व्यर्थ; नंगे  सिज्द:=माथे का वह चिन्ह जो सजदः(सजदा)करते करते पड़ जाता है;
संगे  आस्ताँ=चौखट का पत्थर; गम्माज़ी=चुगली; हमज़बाँ=अपनी जैसी जुबान वाला,(यहाँ "समर्थक" से अभिप्राय है )
दाना=बुद्धिमान;  यक्ता=अद्वितीय(जिसके सामान दुनिया में कोई दूसरा न हो)



Sunday, July 3, 2011

हैराँ हूँ दिल को रोऊँ, के: पीटूँ जिगर को मैं ? HairaaN hoon dil ko ro'oon ki peetoon jigar ko main

हैराँ  हूँ  दिल  को   रोऊँ,  के:  पीटूँ  जिगर  को  मैं
मक़दूर  हो  तो  साथ  रखूँ  नोह: गार  को  मैं

छोड़ा  न:  रश्क   ने   के:  तेरे  घर  का  नाम  लूँ
हर  यक  से  पूछता   हूँ  के:  जाऊँ  किधर  को  मैं ?

जाना  पड़ा  रक़ीब  के  दर  पर  हज़ार  बार
ए  काश !  जानता  न:  तेरे  रहगुज़र  को  मैं

है  क्या  जो  कस  के  बाँधिए,  मेरी  बाला  डरे
क्या  जनता  नहीं  हूँ  तुम्हारी  कमर  को  मैं

लो  वो:  भी  कहते  हैं  के: ये:  बे  नंग-ओ-नाम  है
ये: जानता  अगर,  तो  लुटाता  न:  घर  को  मैं

चलता  हूँ  थोड़ी  दूर  हर  इक  तेज़रौ  के  साथ
पहचानता  नहीं  हूँ  अभी  राहबर  को  मैं

ख़्वाहिश  को  अहमक़ों  ने  परस्तिश  दिया  क़रार
क्या  पूजता  हूँ  उस  बूते  बेदादगर   को   मैं ?

फिर  बेखुदी  में  भूल  गया  राहे  कू-ए-यार
जाता  वगर्न: एक  दिन  अपनी  ख़बर  को  मैं

अपने  पे: कर  रहा  हूँ  कियास   अहले  दहर  का
समझा  हूँ   दिल पज़ीर   मताअ-ए-हुनर  को  मैं

ग़ालिब ! खुदा  करे  के:  सवारे  समन्दे  नाज़
देखूँ   अली  बहादुरे   आली  गुहर   को   मैं
                                               - मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ  'ग़ालिब'
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मक़दूर=सामर्थ्य;  नोह: गार=मातम करने वाला;  रश्क=इर्ष्या;  रक़ीब=प्रतिद्वंदी(दुसमन); रहगुज़र=मार्ग;
बे नंग-ओ-नाम=बद चलन;  तेज़रौ=तीव्रगामी(तेज़ चलने वाली);  राहबर=मार्ग दर्शक; परस्तिश=पूजना;
बूते  बेदादगर=मस्ती;  राहे  कू-ए-यार=प्रेमी की गली का मार्ग;  कियास=अनुमान;  अहले  दहर=दुनिया वाले;
दिल पज़ीर=मनोवांछित(मन मुताबित);  मताअ-ए-हुनर=कला की सम्पत्ति;  सवारे  समन्दे  नाज़=गर्व के
घोड़े पे सवार;  अली  बहादुरे=ग़ालिब का मित्र;   आली गुहर=अधिक मूल्यवान;

Tuesday, June 28, 2011

ये: न: थी हमारी क़िस्मत के विसाले यार होता Ye na thi hamari kismat ke visale yaar hota-Galib

Mirza Ghalib poetry in Hindi
ये:  न:  थी  हमारी  क़िस्मत  के  विसाले  यार  होता
अगर  और  जीते  रहते , यही   इंतज़ार  होता

तेरे  वादे  पर  जिए  हम , तो  ये:,  जान  झूठ  जाना
के  ख़ुशी  से  मर  न: जाते, अगर  एतिबार  होता

तेरी  नाजुकी  से  जाना  के: बँधा  था  अहद  बोदा
कभी  तू  न: तोड़  सकता, अगर  उस्तवार होता

कोई  मेरे  दिल  से  पूछे,  तेरे  तीरे नीमकश  को
ये  ख़लिश  कहाँ  से  होती,  जो  जिगर  के  पार होता

ये: कहाँ  की  दोस्ती  है  के:  बने  हैं  दोस्त,  नासेह
कोई  चारासाज़  होता,  कोई  ग़मगुसार  होता

रगे  संग  से  टपकता  वो: लहू  के: फिर  न:  थमता
जिसे  ग़म  समझ  रहे  हो,  ये:  अगर  शरार  होता

गम   अगर्चे  जाँगुसिल  है,  पे:  कहाँ  बचें  के: दिल है
गमे  इश्क  गर  न  होता,  गमे  रोज़गार   होता

कहूँ   किससे  मैं   के: क्या  है, शबे  ग़म  बुरी  बाला  है
मुझे  क्या  बुरा  था  मरना  अगर  एक  बार  होता

हुए  मर  के:  हम  जो  रुस्वा,  हुए  क्यूँ  न:  गर्के  दरिया
न:  कभी  जनाज़ा  उठता, न  कहीं  मज़ार  होता

उसे  कौन  देख  सकता  के:, यागन:  है  वो: यक्ता
जो  दुई  की  बू  भी  होती,  तो  कहीं  दुचार  होता

ये:  मसाइले  तसव्वुफ़ ,  ये  तेरा  बयान, ग़ालिब !
तुझे  हम  वली  समझते, जो  न:  बादः ख्वार  होता

                                                                                               -मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ  'ग़ालिब'

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विसाले=मिलन ;  अहद  बोदा=कच्ची प्रतिज्ञा ;  उस्तवार=पक्का ;  तीरे नीमकश=अध खींचा हुआ तीर ;
ख़लिश=चुभन ;  नासेह=एक या बहुत से आदमी ;  चारासाज़=उपचारक ;  ग़मगुसार=दुःख का साथी ;  रगे  संग=पत्थर की नस ;  शरार=चिंगारी ;  अगर्चे=यधपि,गोकि ;  जाँगुसिल=कष्टदायक ;
गमे  इश्क=प्रेम का संताप ;  गमे  रोज़गार=संसार की चिन्ता ;  शबे  ग़म=रात्रि का विरह(विरह=जुदाई का दर्द);
रुस्वा=बदनाम ;  गर्के  दरिया=दरिया में डूबना ;  यागन:=अलग ;  यक्ता=अकेला ;  दुई=झगड़ा ;
दुचार=सामने आना ;  मसाइले  तसव्वुफ़=ब्रहमवाद की समस्याएं ;   बादः ख्वार=शराबी ;

Saturday, June 4, 2011

अजब नशात से, जल्लाद के चले हैं हम आगे Ajab nashat se jallad ke chale hain hum aage-Galib

अजब  नशात  से, जल्लाद के चले  हैं  हम आगे
के: अपने साये से सर, पाँव से है दो कदम आगे

कज़ा  ने  था  मुझे  चाहा  ख़राबे  बादः-ए-उल्फ़त
फ़क़त  'ख़राब' लिखा, बस नः चल सका कलम आगे

ग़मे  ज़मानः ने  झाड़ी  नाश्ते  इश्क़  की मस्ती
वगर्न: हम भी उठाते थे लज्ज़ते  अलम  आगे

खुदा  के  वास्ते  दाद  इस जुनूने शौक़ की देना
के  उसके  दर  पे: पहोंचते हैं नामःबार से हम आगे

ये:  उम्र  भर  जो  परीशानियाँ  उठाई  हैं  हमने
तुम्हारे आइयो  ऐ  तुर्र: हाए ख़म  बः  ख़म, आगे

दिल-ओ-जिगर  में  परअफशाँ जो एक  मौज:-ए-खूँ  है
हम  अपने  ज़ओम में समझे हुए थे उसको दम आगे

क़सम  जनाज़े  पे: आने  की  मेरे  खाते  हैं  'ग़ालिब'
हमेशा: खाते  थे  जो  मेरी जान  की  क़सम, आगे 

                                        -मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ  'ग़ालिब'

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नशात=हर्ष;  कज़ा=मौत;  ख़राबे  बादः-ए-उल्फ़त=मदिरा की चाहत मे नष्ट;  ग़मे  ज़मानः=दुनिया के दुःख;
नाश्ते  इश्क़=प्रेम का हर्ष (खुसी);   लज्ज़ते  अलम=दुखों का आनंद;  नामःबार=डाकिया;  
तुर्र: हाए ख़म  बः  ख़म=घूँघरियली बालों की लटें;   परअफशाँ=व्याकुल (बेचैन);
    मौज:-ए-खूँ=खून की लहर;  ज़ओम=घमंड;   दम=सांस;           

Sunday, May 22, 2011

हुई ताखीर, तो कुछ बाइसे ताखीर भी था Hui takhir, Toh kuch baaise takhir bhi tha

हुई ताखीर, तो कुछ बाइसे ताखीर भी था
आप आते थे, मगर कोई इनाँगीर भी था

तुमसे बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला
उससे कुछ शाइब-ए-खूबी-ए-तकदीर भी था

तू मुझे भूल गया हो तो पता बतला दूं
कभी फ़ितराक में तेरे कोई नख्चीर भी था ?

कैद में है तेरे वहशी की वोही जुल्फ की याद
हाँ कुछ इक रंजे गराँ बारि-ए-जंजीर भी था

बिजली कोंद गई आँखों के आगे, तो क्या
बात करते, के: मैं लब तश्न:-ए-तक़रीर भी था

युसूफ उसको कहूँ और कुछ  न: कहे, ख़ैर हुई
गर बिगड़  बैठे, तो  मैं लायक़े तअज़ीर भी था

देखकर  गैर,  क्यों हो न: कलेजा ठंडा
नाल: करता था, वले तालिबे तासीर भी था

पेशे में ऐब नहीं, रखिए नः  'फरहाद' को  नाम
हम ही आशुफ़्ता सरों में वोः जवाँ  'मीर'  भी था

हम थे मरने को खड़े, पास नः आया, नः सही
आख़िर उस शोख़ के तरकश में कोई तीर भी था

पकडे जातें हैं फ़रिश्तों के लिखे पर नाहक
आदमी कोई हमारा दमे तहरीर भी था ?

रेख्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो  'ग़ालिब'
कहतें हैं, अगले ज़माने में कोई  'मीर' भी था  

                          -मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ  'ग़ालिब'

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ताखीर=ढील,देर;  बाइसे=कारण;  बेजा=बिना कारण;  शाइब=मिलावट,शक;  खूबी-ए-तकदी=सौभाग्य;
फ़ितराक=शिकारी का थैला;  नख्चीर=शिकार किया हुआ जानवर;  वहशी=पागल;  बारि-ए-जंजीर=जंजीर
के बोझ का कष्ट;  कोंद=चमक देना;   तश्न:-ए-तक़रीर=प्यासे होटों की आवाज;  युसूफ=एक अवतार का
नाम जो अपनी सुन्दरता में प्रसिद्ध थे(यहाँ प्रेमी लिया गया है);  तअज़ीर=सजा के योग्य;  नाल:=रुदन(रोना)
तासीर=प्रभाव;  सरों=दीवानों,पागलों;  मीर=ग़ालिब से पूर्व एक प्रसिद्ध शायर का नाम;  सोख़=चंचल;



Wednesday, October 27, 2010

हर एक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है Har Ek Baat Pe Kahte Ho Tum ke Tu Kya Hai

हर एक बात पे कहते हो तुम, के  तू क्या है
तुम्ही कहो के ये अंदाजे गुफ्तगू क्या है

न शोले में ये करिश्म न बर्क में ये अदा
कोई बताओ के वो शोखे तन्द्खु क्या है

ये रश्क है के वो होता है हमसुखन तुमसे
वगर्न खौफे बदआमोजी -ए-अदू क्या है

चिपक रहा है बदन पर  लहू से पैराहन
हमारे जैब को अब हाजते रफू क्या है

जलता है जिस्म जहाँ, दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब रख, जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

वो चीज जिसके लिए हो हमको बहिश्त अज़ीज़
सिवाय बाद-ए-गुलफामे मुश्कबू , क्या है

पियूँ शराब अगर खुम भी देख लूँ दो चार
ये शीशा-ओ-कदह-ओ-कूज ओ सुबू क्या है

रही न ताकते गुफ्तार , और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पर कहिये के आरजू क्या है

हुआ है शाह का मुशाहिब,फिरे है इतराता
वगर्न शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है
                                           -असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब
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अंदाजे गुफ्तगू=बात करने का ढंग;  बर्क=बिजली;  शोखे तन्द्खु=क्रुध स्वभाव की
चंचलता; रश्क=इर्ष्या; हमसुखन=बात करना; खौफे बदआमोजी -ए-अदू=शत्रु की
अबभद्र शिक्षा का डर;  हाजते रफू=रफू की आवश्यकता; बहिश्त=स्वर्ग; अज़ीज़=
प्रिय;  बाद-ए-गुलफामे मुश्कबू=फूलों जैसे रंग एंव मुश्क की सुगंध के सामान मदिरा;
खुम=शराब का मटका; शीशा-ओ-कदह-ओ-कूज ओ सुबू=बोतल,प्याला,एंव कुल्हड़,मटका
गुफ्तार=बात करने की शक्ति; शाह=बादशाह; मुशाहिब=सभासद; आबरू=इज्जत;

   

  

Tuesday, October 26, 2010

ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते है ye hum jo hijr mein diwar-o-dar ko dekhte hain

ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते है
कभी सबा को कभी नामःबार को देखते है

वो आए घर में हमारे,खुदा की कुदरत है
कभी हम उनको,कभी अपने घर को देखते है

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाजू को
ये लोग क्यूं मेरे ज़ख़्म जिगर को देखते है

तेरे जवाहिरे तर्फे कुल को क्या देखें
हम औजे तअले लाल-ओ-गुहार को देखते है

जहाँ तेरा नक़्शे कदम देखते है
खियाबां-खियाबां इरम देखते है

दिल अशुफ्तगां खाले कुंजे दहन के
सुवैदा में सैरे अदम देखते हैं

तेरे सरू कामत से यक कद्दे आसद
क़यामत के फ़ितने को कम देखते हैं

तमाश के ऐ महवे आईन दारी!
तुझे किस तम्मना से हम देखते है

सुरागे तुफे नाल ले दागे दिल से
के शबरौ का नक़्शे कदम देखते है

बनाकर हम फकीरों का भेस 'ग़ालिब' !
तमाशः-ए-अहले करम देखते है
                             -असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब
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हिज्र=विरह(जुदाई), सबा=ठंडी हवा, नामःबार=पत्र वाहक(डाकिया)
दस्त-ओ-बाजू=हाथ और पाँव, जवाहिरे तर्फे कुल=टोपी में टंके हीरे,
औजे तअले लाल-ओ-गुहार=हीरे जवाहरात के भाग्य की प्रतिष्ठा,
खियाबां-खियाबां=फूलों की क्यारी,  इरम=स्वर्ग, दिल अशुफ्तगां=दीवाना दिल,
खाले कुंजे दहन=मुह के कोने का तिल, सुवैदा=काला धब्बा(यहाँ तात्पर्य आँख की
पुतली के तिल से है), सैरे अदम=यम लोक की सैर, सरू कामत=इतना लम्बा के
सरो वृक्ष के सामान, कद्दे आसद=हज़रत आदम(पहला मानव)का कद, फ़ितने=उपद्रव,
महवे आईन दारी=आइना देखने में लीन, तुफे नाल=आर्तनाद(धिक्कार), शबरौ=रात्रि में
चलने वाला, करम=कृपालु,  

  

Monday, October 25, 2010

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक Aah ko chahiye ek umr asar hone tak

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक

दामें हर मौज में है हल्क-ए-सदकामे निहंग
देखें क्या गुजरे है कतरे पे गुहर होने तक

आशिकी सब्र तलब और तम्मना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ खूने जिगर होने तक

हमने माना के तगाफुल न करोगे,लेकिन
खाख हो जाएँगे हम,तुमको खबर होने तक

परतवे खूर से है सबनम को फ़ना की तअलीम
में भी हूँ एक इनायत की नजर होने तक

यक नज़र बेश नहीं फुर्सते हस्ती गाफ़िल
गर्मि-ए-बज़्म है इक रक्से शरर होने तक

गमे हस्ती का 'असद' ! किससे हो जुज मर्ग,इलाज
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होने तक         
                                               -असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब
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दामें हर मौज=हर एक लहर का जाल , हल्क-ए-सदकामे निहंग =सैकड़ों
मगरमच्छ के खुले जबड़े, कतरे=बूँद, गुहर=मोती हीरा ,सब्र तलब=धैर्य
की चाहत, तम्मना बेताब=बेताब तम्मना, तगाफुल=असावधानी
परतवे खूर=सूर्य की किरण,सबनम=ओस, फ़ना की तअलीम=मर मिटने की तालीम
इनायत=कृपा .दया, बेश=अधिक, फुर्सते हस्ती=जीवन की कार्य रिक्ता,
शरर=चिंगारी का नृत्य, गमे हस्ती=जीवन का दुख, 'असद'=एक व्यक्ति का नाम
जुज=सिवाय, मर्ग=मृत्यु, सहर=प्रातः काल(सुबह)
गाफ़िल=निशिचत, गर्मि-ए-बज़्म=सभा की चहल-पहल(बज़्म=सभा,गोष्ठी)

Sunday, October 24, 2010

हुस्ने मह गरचे ब हंगामें कमाल अच्छा है Husne mah garche ba hangame kamaal achha hai

हुस्ने मह गरचे ब हंगामें कमाल अच्छा है
उससे मेरा माहे खुरशीद जमाल अच्छा है

बोस देते नहीं और दिल पे है हर लहज निगाह
जी में कहते हैं के मुफ्त आए तो माल अच्छा है

और बाजार से ले आए,अगर टूट गया
सागरे जम से मेरा जामे सिफाल अच्छा है

बेतलब दें तो मजा उसमें सिवा मिलता है
वो गदा, जिसको  न हो खूं-ए-सवाल, अच्छा है

उनके देखे से आ जाती है मुँह पर रौनक
वो समझते है के बीमार का हाल अच्छा है

देखिए,पाते हैं  उशशाक बुतों से क्या फैज़
इक बिरहमन ने कहा है के ये साल अच्छा है

हम सुखन तेशो ने 'फरहाद' को 'शीरीं' से किया
जिस तरह का के किसी में हो कमाल अच्छा है

क़तर दरिया में जो मिल जाए,तो दरिया हो जाए
काम अच्छा है वो,जिसका के मआल अच्छा है

खिज्र सुल्तां को रखे खलिके अकबर सरसब्ब्ज
शाह के बाग में ये ताज निहाल अच्छा है

हमको मअलूम है जन्नत की हकीक़त, लेकिन
दिल के खुस रखे को 'ग़ालिब' ये ख्य अच्छा है  
             
                                          -असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब
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हुस्ने मह=चन्द्रमा का सौंदर्य , हंगामें कमाल=पूर्णिमा के समय ,
माहे खुरशीद जमाल=यहाँ पर तात्पर्य प्रेमिका की सुन्दरता से है ( मह=चन्द्रमा,
खुरशीद=सूर्य,जमाल=सुन्दरता), बोस=चुम्बन ,  सागरे जम=जमशेद का जाम(जमशेद
-इरान का वह बादशाह जिसने एक ऐसा जाम बनवाया था जिसमे सरे संसार को देखा
जा सकता था) , जामे सिफाल=मिट्टी का प्याला , बेतलब=बिनामंगे ,सिवा=अधिक,
गदा=भिखारी , खूं-ए-सवाल=मांगने की आदत 

इब्ने मरियम हुआ करे कोई Ibne Mariam Hua Kare koi

इब्ने मरियम हुआ करे कोई
मेरे दुख की दावा करे कोई

शर्र-ओ-आईन पर मदार शाही
ऐसे कातिल का क्या करे कोई

चाल जैसे कड़ी कमाँ का तीर
दिल में ऐसे के जा करे कोई

बात पर वाँ जबान कटती है
वो कहें और सुना करे कोई

बक रहा हूँ जुनूँ में क्या-क्या कुछ
कुछ न समझे खुदा करे कोई

न सुनो, गर बुरा कहे कोई
न कहो, गर बुरा करे कोई

रोक लो,गर गलत चले कोई
बख्श दो,गर खता करे कोई

कौन है जो नहीं है हाजतमंद ?
किसकी हाजत रवा करे कोई

क्या किया खिज्र ने  सिकंदर से !
अब किसे रहनुमा करे कोई !

जब तवक्को ही उठ गई 'ग़ालिब'
क्यूँ किसी का गिला करे कोई 

                         -असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब
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मरियम=मरियम का बेटा 'इसा';( इसा ! वह अवतार जो मृतकों को
जीवित और रोगियों को अच्छा कर देते थे ) ,शर्र-ओ-आईन=धार्मिक नियम,
मदार=निर्भर ,जा=जगह , हाजतमंद=इच्छुक , हाजत रवा करे=इच्छा पूरी करे
खिज्र=अवतार (वह जो अमर है और भटके हुओं का मार्ग दर्शन करते हैं )
सिकंदर=(Alexander)  रहनुमा=मार्ग दर्शक , तवक्को=आशा

नुक्तः चीं है, गम-ऐ-दिल उसको सुनाए न बने Nukta chin hai gham-e-dil usko sunae na bane

नुक्तः चीं है, गम-ऐ-दिल उसको सुनाए न बने
क्या बने बात,जहाँ बात बनाए  न बने

मैं बुलाता तो हूँ उसको मगर ऐ जज्ब-ए-दिल !
उस पे बन जाए कुछ ऐसी के बिन आए न बने

खेल समझता है, कहीं छोड़ न दे,भूल न जाए
काश ! यूं भी हो के बिन मेरे सताए न बने

गैर फिरता है लिए यूं तेरे ख़त को,के अगर
कोई पूछे के ये क्या है तो छुपाए न बने

इस नजाकत का बुरा हो,वो भले हैं तो क्या
हाथ आएं, तो उन्हें हाथ लगाए न बने

कह सके कौन के ये जल्वःगरी किसकी है
पर्द छोड़ा है वो उनसे के उठाए न बने

मौत की रह न देखूं ? के बिन आए न रहे
तुमको चाहूँ ? के न आओ,तो बुलाए न बने

बोझ वो सर से गिरा है के उठाए न उठे
काम वो आन पड़ा है के बनाए न बने

इश्क पर जोर नहीं है ये वो आतश 'ग़ालिब' !
के लगाए  न लगे,और बुझाए न बने

                                -असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब    

Sunday, October 17, 2010

हज़ारों खाव्हिशें ऐसी, की हर ख्वाहिश पे दम निकले Hazaaron Khwaishein Aisi Ki Har Khwaish Pe Dam Nikle

हज़ारों खाव्हिशें ऐसी, की हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान,लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा कातिल,क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खूं जो चश्मे-तेर-से उम्र-भर यूं दम-ब-दम निकले

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन
बहुत बे आबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले

भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे कामत की दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेचोख़म का पेचोख़म निकले

मगर लिखवाए कोई उसको ख़त,तो हमसे लिखवाए
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर  कलम निकले

हुई इस दौर में मंसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो जमाना,जो जहाँ में जामें-जम निकले

हुई जिनको तव्वको ख़स्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़े सितम निकले

मोहब्बत  में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देखकर जीतें हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

खुदा के वास्ते पर्दा न काबे का उठा ज़ालिम
कहीं ऐसा न हो यां भी वही काफ़िर सनम निकले

कहाँ मैखाने का दरवाजा 'ग़ालिब',और कहाँ वाईज़
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था की हम निकले

                                             -असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब