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Tuesday, November 29, 2016

कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो Kathin hai rahguzar thodi dur sath chalo

कठिन-है-राह-गुज़र-थोड़ी-देर-साथ-चलो
कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो।
बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी देर साथ चलो।

तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो।

नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो।

ये एक शब की मुलाक़ात भी गनीमत है
किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो।

तवाफ़-ए-मंज़िल-ए-जाना हमें भी करना है
‘फ़राज़’ तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो।
                                             
                                                          - अहमद फ़राज़

Sunday, August 14, 2011

ख़िरद मन्दो से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है Khirad mando se kya poochhoon ki meri ibtida kya hai.

Iqbal shayari in hindi
ख़िरद मन्दो  से  क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है
कि मैं इस फिक्र में रहता हूँ मेरी इन्तहा क्या है

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रिज़ा क्या है

नज़र आई  मुझे तक़दीर की गहराइयाँ इसमें
न पूछ ऐ हमनशी मुझसे वो चश्मे-सुर्मा-सा क्या है

नवाए-सुबह गाही ने जिगर खूँ कर दिया मेरा
खुदाया जिस खता की यह सज़ा है वो खता क्या है  

                                       - अल्लामा मुहम्मद 'इक़बाल'
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 ख़िरद=ज्ञानी ; इब्तिदा=आरंभ ; इन्तहा=अंत ; रिज़ा=भाग्य ; हमनशी=इच्छा ;
 चश्मे-सुर्मा=आँख का सुर्मा ; नवाए-सुबह=सुबह की आवाजें ; 

Sunday, May 22, 2011

हुई ताखीर, तो कुछ बाइसे ताखीर भी था Hui takhir, Toh kuch baaise takhir bhi tha

हुई ताखीर, तो कुछ बाइसे ताखीर भी था
आप आते थे, मगर कोई इनाँगीर भी था

तुमसे बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला
उससे कुछ शाइब-ए-खूबी-ए-तकदीर भी था

तू मुझे भूल गया हो तो पता बतला दूं
कभी फ़ितराक में तेरे कोई नख्चीर भी था ?

कैद में है तेरे वहशी की वोही जुल्फ की याद
हाँ कुछ इक रंजे गराँ बारि-ए-जंजीर भी था

बिजली कोंद गई आँखों के आगे, तो क्या
बात करते, के: मैं लब तश्न:-ए-तक़रीर भी था

युसूफ उसको कहूँ और कुछ  न: कहे, ख़ैर हुई
गर बिगड़  बैठे, तो  मैं लायक़े तअज़ीर भी था

देखकर  गैर,  क्यों हो न: कलेजा ठंडा
नाल: करता था, वले तालिबे तासीर भी था

पेशे में ऐब नहीं, रखिए नः  'फरहाद' को  नाम
हम ही आशुफ़्ता सरों में वोः जवाँ  'मीर'  भी था

हम थे मरने को खड़े, पास नः आया, नः सही
आख़िर उस शोख़ के तरकश में कोई तीर भी था

पकडे जातें हैं फ़रिश्तों के लिखे पर नाहक
आदमी कोई हमारा दमे तहरीर भी था ?

रेख्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो  'ग़ालिब'
कहतें हैं, अगले ज़माने में कोई  'मीर' भी था  

                          -मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ  'ग़ालिब'

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ताखीर=ढील,देर;  बाइसे=कारण;  बेजा=बिना कारण;  शाइब=मिलावट,शक;  खूबी-ए-तकदी=सौभाग्य;
फ़ितराक=शिकारी का थैला;  नख्चीर=शिकार किया हुआ जानवर;  वहशी=पागल;  बारि-ए-जंजीर=जंजीर
के बोझ का कष्ट;  कोंद=चमक देना;   तश्न:-ए-तक़रीर=प्यासे होटों की आवाज;  युसूफ=एक अवतार का
नाम जो अपनी सुन्दरता में प्रसिद्ध थे(यहाँ प्रेमी लिया गया है);  तअज़ीर=सजा के योग्य;  नाल:=रुदन(रोना)
तासीर=प्रभाव;  सरों=दीवानों,पागलों;  मीर=ग़ालिब से पूर्व एक प्रसिद्ध शायर का नाम;  सोख़=चंचल;



Saturday, May 14, 2011

दोस्त अहबाब की नज़रों में (Dost ki ahbaab nazron mein)

दोस्त अहबाब की नज़रों में बुरा हो गया मैं
वक़्त की बात है क्या होना था क्या हो गया मैं

दिल के दरवाज़े को वा रखने की आदत थी मुझे
याद आता नहीं कब किससे जुदा हो गया मैं

कैसे तू सुनता बड़ा शोर था सन्नाटों का
दूर से आती हुई ऐसी सदा हो गया मैं

क्या सबब इसका था, मैं खुद भी नहीं जानता हूँ
रात खुश आ गई और दिन से ख़फ़ा हो गया मैं

भूले-बिछड़े हुए लोगों में कशिश अब भी है
उनका ज़िक्र आया कि फिर नग़्मासरा हो गया मैं

                                                                 -शहरयार
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वा=खुला; नग़्मासरा= सुमधुर गाने वाला

Friday, March 25, 2011

हुस्न भी था उदास HUSSAN BHI THA UDAS

हुस्न भी था उदास,उदास ,शाम भी थी धुआं-धुआं  ,
याद सी आके रह गयी दिल को कई कहानियां |

छेड़ के दास्तान-ए-गम अहले वतन के दरमियाँ ,
हम अभी बीच में थे और बदल गई ज़बां |

सरहद-ए-ग़ैब तक तुझे साफ मिलेंगे नक्श-ए-पा ,
पूछना यह फिरा हूं मैं तेरे लिए कहां- कहां |

रंग जमा के उठ गई कितने तमददुनो की बज्म ,
याद नहीं ज़मीन को , भूल गया है आसमां |

जिसको भी देखिए वहीँ बज़्म में है गज़ल सरा,
छिड़ गयी दास्तान-ए-दिल बहदीस-ए-दीगरा |

बीत गए है लाख जुग सूये वतन चले हुए ,
पहुंची है आदमी की ज़ात चार कदम कशां-कशां |

जैसे से खिला हुआ गुलाब चांद के पास लहलहाए
रात वह दस्त-ए-नाज़ में जाम-ए-निशात-ए-अरगवां |

मुझको फिराक़ याद है पैकर-ए-रंग-ओ-बूए दोस्त ,
पांव से ता जबी-ए-नाज , मेहर फशां-ओ-मह चुका |
                                                                -फ़िराक़ गोरखपुरी
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अहले वतन=देशवासी ; सरहद-ए-ग़ैब=अज्ञात सीमा ;
नक्श-ए-पा=पांव के निशान ; तमददुनो=सभ्यताओं ;
सरा=गायक ; बहदीस-ए-दीगरा=दूसरों की बातों के साथ
सूये=तरफ,ओर ;  कशां-कशां=खिंचे-खिंचे ;दस्त-ए-नाज़=नाजुक हाथ;
जाम-ए-निशात-ए-अरगवां=उनके हाथों में शराब क जाम बिकुल ऐसे
ही है जी चांद के पास खिला हुआ गुलाब ; पैकर-ए-रंग-ओ-बूए दोस्त=
महबूब की छवि-रंग और सुगंध ; जबी-ए-नाज=पांव से माथे तक
फशां-ओ-मह चुका=सूरज और चांद की तरह रोशनी फूट रही है |



Saturday, February 26, 2011

चाँद तनहा है Chand Tanha Hai

Best Poetry Collection in Hindi
 चाँद  तनहा  है  आसमान  तनहा
दिल  मिला  है  कहाँ  कहाँ  तनहा

बुझ  गयी  आस  छुप  गया  तारा
थर  थराता  रहा  धुआं  तनहा

ज़िन्दगी  क्या  इसी  को  कहते  हैं
जिस्म  तनहा  है  और  जां  तनहा

हमसफ़र  कोई  गर  मिले  भी  कहीं
दोनों  चलते  रहे  तनहा  तनहा

जलती  बुझती  सी  रोशनी  के  परे
सिमटा  सिमटा  सा  एक  मकां तनहा

राह  देखा  करेगा  सदियों  तक
छोड़  जायेंगे  ये  जहां  तनहा
              
                                                      -मीना कुमारी

Wednesday, December 22, 2010

ये इश्क नहीं आसां एक आग का दरिया है Yeh Ishq Nahi Aasan Aik Aag Ka Dariya Hai

वो  बोले 

ये  इश्क  नहीं  आसां , इतना  तो  समझ  लीजिये
एक  आग  का  दरिया  है , और  डूब  के  जाना  है

मैंने  कहा

 मासूम  सी  मोहब्बत  का  बस  इतना  सा   फ़साना  है
कागज  की  हवेली  है , बारिश  का  ज़माना  है

क्या  शर्त -ए -मोहब्बत  है , क्या  शर्त -ए -ज़माना  है 
आवाज़  भी  जख्मी  है  और  वो  गीत  भी  गाना  है

उस 
पार  उतरने  की  उम्मीद  बहुत  कम  है
कश्ती  भी  पुरानी  है , तूफ़ान  भी  आना  है

समझे  या  न  समझे  वो  अंदाज़ -ए -मोहब्बत  का
भीगी  हुई  आँखों  से  एक  शेर  सुनाना  है

भोली  सी  अदा , कोई  फिर  इश्क  की  जिद  पर  है
फिर  आग  का  दरिया  है  और  डूब  ही  जाना  है 

Friday, December 3, 2010

हमारी हर कहानी में तुम्हार नाम आता है Hamaari Har Kahaani Mein Tumhara Naam Aataa Hai

हमारी हर कहानी में तुम्हार नाम आता है
ये कैसे सबको समझाएं कि तुमसे कैसा नाता है

न जाने चाँद पूनम का ये क्या जादू चलाता है
कि पागल हो रहीं लहरें समंदर कशमकाता है
जरा सी परवरिश भी चाहिए हर एक रिशते को
अगर सींचा नहीं जाए तो पौधा सूख जाता है

हमारी हर कहानी में तुम्हार नाम आता है
ये कैसे सबको समझाएं कि तुमसे कैसा नाता है

ये मेरे और गम के बीच में किस्सा है वर्षों से
में उसको आजमाता हूँ वो मुझको आजमाता है
जिसे चींटी से लेकर चाँद , सूरज सभी सिखाया था
वही बेटा बड़ाहोकर सबक मुझको पढाता है
नहीं है बेई मानी गर ये बादल की तो फिर क्या है
मरूस्थल छोड़कर जाने कहाँ पानी गिरता है     

हमारी हर कहानी में तुम्हार नाम आता है
ये कैसे सबको समझाएं कि तुमसे कैसा नाता है

ख़ुदा का खेल ये अबतक नहीं समझे के वो हमको
बना कर क्यों मिटाता है , मिटा कर क्यों बनाता है
वो बर्षों बाद आकर कह गया फिर जल्दी आने को
पता माँ बाप को भी है वो कितनी जल्दी आता है

हमारी हर कहानी में तुम्हार नाम आता है
ये कैसे सबको समझाएं कि तुमसे कैसा नाता है

Saturday, November 6, 2010

हम दीवानों की क्या हस्ती Ham Deewanon ki kya Hasti

हम दीवानों की क्या हस्ती
है आज यहाँ , कल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चला
हम धुल उड़ाते जहाँ चले
              आए बनकर उल्लास अभी
              आंसू बनकर बह चले अभी
सब कहते ही रह गए , अरे
तुम कैसे आए , कहाँ चले !
किस ओर चले ? यह मत पूछो
चलना है , बस इसलिए चले
जग से उसका कुछ लिए चले
जग को अपना कुछ दिए चले
              दो बात कही दो बात सुनी !
              कुछ हंसे और फिर कुछ रोए !
छककर सुख-दुःख के घूँटों को
हम एक भाव से पिए चले !
              हम भिखमंगों की दुनिया में
              स्वच्छंद लुटाकर प्यार चले
              हम एक निशानी-सी उर पर
              ले असफलता का भर चले
हम मान रहित , अपमान रहित
जी भरकर खुलकर खेल चुके
              हम हँसते-हँसते आज यहाँ
              प्राणों की बाजी हार चले !
हम भला बुरा सब भूल चुके
नत मस्तक हो मुख मोड़ चले
अभिशाप उठा कर होंठों पर
वरदान दृगों पर छोड़ चले
               अब अपना क्या पराया क्या ?
               आबाद रहें रुकने वाले !
हम स्वयंम बँधे थे और स्वयंम
हम अपने बंधन तोड़ चले !
    

शायद नहीं Shaayad Nahi

तुम्हारे चहरे के उल्लास को
चंचलता को
अतीत से खोज रही मेरी बूढ़ी आँखे
जिसमे भरे थे
 गुलमोहर के फूलों के चटक रंग
और तुम्हारे पास होने का अहसास
दबी-दबी सी मधुर आवाज
छुन-छुन करती धीमी सी हंसी
आज भी मेरे ठसा-ठस भरे दिल के
कोने में चिपकी पड़ी है
कच्चे गडारों वाले रास्ते
जो खेतों के बिच गहराते जा रहे हैं
बैलों की घंटियों की रूनझुन आवाज
मेरी जिन्दगी बाजरे के खनखनाते दानो सी
खुशियों से भरी थी
वो सब तुम्हरे आंचल में
तुम्हरी आँखों में मैंने देखा था
प्यार का सरमाया
क्या ऐसे प्यार के हमसफ़र खोजे जा सकते है
और क्या तुम्हरी देहगंध सी मदहोशी
कहीं और मिल पाएगी
शायद नहीं  
                               -इश्वर चंद्र सक्सेना

Monday, October 25, 2010

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक Aah ko chahiye ek umr asar hone tak

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक

दामें हर मौज में है हल्क-ए-सदकामे निहंग
देखें क्या गुजरे है कतरे पे गुहर होने तक

आशिकी सब्र तलब और तम्मना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ खूने जिगर होने तक

हमने माना के तगाफुल न करोगे,लेकिन
खाख हो जाएँगे हम,तुमको खबर होने तक

परतवे खूर से है सबनम को फ़ना की तअलीम
में भी हूँ एक इनायत की नजर होने तक

यक नज़र बेश नहीं फुर्सते हस्ती गाफ़िल
गर्मि-ए-बज़्म है इक रक्से शरर होने तक

गमे हस्ती का 'असद' ! किससे हो जुज मर्ग,इलाज
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होने तक         
                                               -असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब
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दामें हर मौज=हर एक लहर का जाल , हल्क-ए-सदकामे निहंग =सैकड़ों
मगरमच्छ के खुले जबड़े, कतरे=बूँद, गुहर=मोती हीरा ,सब्र तलब=धैर्य
की चाहत, तम्मना बेताब=बेताब तम्मना, तगाफुल=असावधानी
परतवे खूर=सूर्य की किरण,सबनम=ओस, फ़ना की तअलीम=मर मिटने की तालीम
इनायत=कृपा .दया, बेश=अधिक, फुर्सते हस्ती=जीवन की कार्य रिक्ता,
शरर=चिंगारी का नृत्य, गमे हस्ती=जीवन का दुख, 'असद'=एक व्यक्ति का नाम
जुज=सिवाय, मर्ग=मृत्यु, सहर=प्रातः काल(सुबह)
गाफ़िल=निशिचत, गर्मि-ए-बज़्म=सभा की चहल-पहल(बज़्म=सभा,गोष्ठी)

Sunday, October 17, 2010

हज़ारों खाव्हिशें ऐसी, की हर ख्वाहिश पे दम निकले Hazaaron Khwaishein Aisi Ki Har Khwaish Pe Dam Nikle

हज़ारों खाव्हिशें ऐसी, की हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान,लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा कातिल,क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खूं जो चश्मे-तेर-से उम्र-भर यूं दम-ब-दम निकले

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन
बहुत बे आबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले

भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे कामत की दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेचोख़म का पेचोख़म निकले

मगर लिखवाए कोई उसको ख़त,तो हमसे लिखवाए
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर  कलम निकले

हुई इस दौर में मंसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो जमाना,जो जहाँ में जामें-जम निकले

हुई जिनको तव्वको ख़स्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़े सितम निकले

मोहब्बत  में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देखकर जीतें हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

खुदा के वास्ते पर्दा न काबे का उठा ज़ालिम
कहीं ऐसा न हो यां भी वही काफ़िर सनम निकले

कहाँ मैखाने का दरवाजा 'ग़ालिब',और कहाँ वाईज़
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था की हम निकले

                                             -असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब