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Saturday, December 24, 2016

बहुत दराज़ फ़साना है ये Bahut daraaz fasaanaa hai ye

Bahut daraaz fasaanaa hai ye

बहुत दराज़ फ़साना है ये
इक ज़ख्म बहुत पुराना है ये

कुछ रोग होते हैं लाइलाज़
इक ज़ख्म खा के जाना है ये

गीत विरह का उम्र भर ही
हमको बस अब गाना है ये

कुछ लोग मिलते हैं किस्मतों से
उस से बिछड़ के जाना है ये

है इश्क़ नहीं ये सब के लिए
"राज" हमने अब माना है ये

Thursday, December 15, 2016

तुम जाओ हम से दूर तो एक काम कर जाना Tum jao hum se door to Ek kaam kar jana

Tum jao hum se door to Ek kaam kar jana
तुम जाओ हम से दूर तो एक काम कर जाना
कुछ पल अपने हमारे नाम कर जाना

अगर आ जाए मौत हमें आप क आने से पहले
तो आ कर मेरे जनाज़े का एहतराम कर जाना

ना रोना इश क़दर कि तकलीफ़ हो हमें
मौत को भी मज़ाक़ समझ कर अंजन बन जाना

मैं एक दिन सो जाऊं गा सदा क लिए
फिर मुझे बेवफा कह कर बदनाम कर जाना

जो गुज़रो मेरी क़बर से तो नज़रें न फेरना
अजनबी ही बन के दुआ सलाम कर जाना

Monday, October 10, 2011

ज़िक्र उस परीवश का, और फिर बयाँ अपना Jikra us parivash ka aur fir bayaan apna

ज़िक्र  उस  परीवश  का, और  फिर  बयाँ  अपना
बन  गया  रक़ीब  आखिर,  था  जो  राज़दाँ  अपना

मय  वो:  क्यूँ  बहुत  पीते  बज़्मे  ग़ैर  में  यारब !
आज  ही  हुआ  मंजूर  उन  को  इम्तिहाँ  अपना

मंज़र  इक  बुलन्दी  पर  और  हम  बना  सकते
अर्श  से  इधर  होता  काश  के  मकाँ  अपना

दे  वो: जिस  क़दर  ज़िल्लत,  हम  हँसी  में  टालेंगे
बारे  आशना  निकला  उनका  पासबाँ,  अपना

दर्दे  दिल  लिखूँ  कब  तक, जाऊँ  उनको  दिखला  दूँ
उंगलियाँ  फ़िगार  अपनी,  खाम: खूँ  चकाँ  अपना

घिसते  घिसते  मिट  जाता,  आपने  अबस  बदला
नंगे  सिज्द:  से  मेरे,  संगे  आस्ताँ  अपना

ता  करे  न  गम्माज़ी , कर  लिया  है  दुश्मन  को
दोस्त  की   शिकायत  में  हमने  हमज़बाँ  अपना

हम  कहाँ  के  दाना  थे,  किस  हुनर  में  यक्ता  थे
बेसबब  हुआ ‘ग़ालिब’ ! दुश्मन  आसमाँ  अपना
                                                           -मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ  'ग़ालिब'
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परीवश=सुन्दरी; रक़ीब=प्रतिद्वंदी(दुसमन);  राज़दाँ=भेद जानने  वाला; मय=शराब;  बज़्मे=गोष्ठी(महफ़िल);
अर्श=आकास; ज़िल्लत=अपमान;  पासबाँ=द्वारपाल(gatekeeper); फ़िगार=घायल; खाम: खूँ  चकाँ=खून से
भरा कलम; अबस=व्यर्थ; नंगे  सिज्द:=माथे का वह चिन्ह जो सजदः(सजदा)करते करते पड़ जाता है;
संगे  आस्ताँ=चौखट का पत्थर; गम्माज़ी=चुगली; हमज़बाँ=अपनी जैसी जुबान वाला,(यहाँ "समर्थक" से अभिप्राय है )
दाना=बुद्धिमान;  यक्ता=अद्वितीय(जिसके सामान दुनिया में कोई दूसरा न हो)



Tuesday, June 28, 2011

ये: न: थी हमारी क़िस्मत के विसाले यार होता Ye na thi hamari kismat ke visale yaar hota-Galib

Mirza Ghalib poetry in Hindi
ये:  न:  थी  हमारी  क़िस्मत  के  विसाले  यार  होता
अगर  और  जीते  रहते , यही   इंतज़ार  होता

तेरे  वादे  पर  जिए  हम , तो  ये:,  जान  झूठ  जाना
के  ख़ुशी  से  मर  न: जाते, अगर  एतिबार  होता

तेरी  नाजुकी  से  जाना  के: बँधा  था  अहद  बोदा
कभी  तू  न: तोड़  सकता, अगर  उस्तवार होता

कोई  मेरे  दिल  से  पूछे,  तेरे  तीरे नीमकश  को
ये  ख़लिश  कहाँ  से  होती,  जो  जिगर  के  पार होता

ये: कहाँ  की  दोस्ती  है  के:  बने  हैं  दोस्त,  नासेह
कोई  चारासाज़  होता,  कोई  ग़मगुसार  होता

रगे  संग  से  टपकता  वो: लहू  के: फिर  न:  थमता
जिसे  ग़म  समझ  रहे  हो,  ये:  अगर  शरार  होता

गम   अगर्चे  जाँगुसिल  है,  पे:  कहाँ  बचें  के: दिल है
गमे  इश्क  गर  न  होता,  गमे  रोज़गार   होता

कहूँ   किससे  मैं   के: क्या  है, शबे  ग़म  बुरी  बाला  है
मुझे  क्या  बुरा  था  मरना  अगर  एक  बार  होता

हुए  मर  के:  हम  जो  रुस्वा,  हुए  क्यूँ  न:  गर्के  दरिया
न:  कभी  जनाज़ा  उठता, न  कहीं  मज़ार  होता

उसे  कौन  देख  सकता  के:, यागन:  है  वो: यक्ता
जो  दुई  की  बू  भी  होती,  तो  कहीं  दुचार  होता

ये:  मसाइले  तसव्वुफ़ ,  ये  तेरा  बयान, ग़ालिब !
तुझे  हम  वली  समझते, जो  न:  बादः ख्वार  होता

                                                                                               -मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ  'ग़ालिब'

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विसाले=मिलन ;  अहद  बोदा=कच्ची प्रतिज्ञा ;  उस्तवार=पक्का ;  तीरे नीमकश=अध खींचा हुआ तीर ;
ख़लिश=चुभन ;  नासेह=एक या बहुत से आदमी ;  चारासाज़=उपचारक ;  ग़मगुसार=दुःख का साथी ;  रगे  संग=पत्थर की नस ;  शरार=चिंगारी ;  अगर्चे=यधपि,गोकि ;  जाँगुसिल=कष्टदायक ;
गमे  इश्क=प्रेम का संताप ;  गमे  रोज़गार=संसार की चिन्ता ;  शबे  ग़म=रात्रि का विरह(विरह=जुदाई का दर्द);
रुस्वा=बदनाम ;  गर्के  दरिया=दरिया में डूबना ;  यागन:=अलग ;  यक्ता=अकेला ;  दुई=झगड़ा ;
दुचार=सामने आना ;  मसाइले  तसव्वुफ़=ब्रहमवाद की समस्याएं ;   बादः ख्वार=शराबी ;

Monday, May 16, 2011

वो कहती है सुनो जानम मोहब्बत मोम का घर है Wo kahti hai suno janam mohabbat mom ka ghar hai

Famous shayari collection in Hindi
 वो  कहती  है  सुनो  जानम
मोहब्बत  मोम का  घर  है
तपिश ये बदगुमानी  की
कहीं  पिघला  न  दे  इस को

मैं  कहता  हूँ
जिस  दिल  मैं  ज़रा  भी   बदगुमानी   हो
वहाँ  कुछ  और  हो  तो   हो
मोहब्बत  हो  नहीं  सकती

वो  कहती  है  सदा  ऐसे  ही
क्या  तुम  मुझको  चाहो  गे
के  मैं  इस  में  कमी  बिलकुल
गवारा  कर  नहीं  सकती

मैं  कहता  हूँ
मोहब्बत  क्या  है
यह  तुम  ने  सिखाया  है
मुझे  तुम  से  मोहब्बत  के  सिवा
कुछ  भी  नहीं  आता

वो  कहती  है
जुदाई  से  बहुत  डरता  है  मेरा  दिल
के   खुद  को  तुम  से  हट  कर  देखना
मुमकिन  नहीं  है  अब

मैं  कहता  हूँ
यही  खद्शे  बहुत  मुझ  को  सतातें  हैं
मगर  सच  है  मोहब्बत  में
जुदाई  साथ  चलती  है

वो  कहती  है
बताओ  क्या  मेरे  बिन  जी  सको  गे  तुम
मेरी  बातें, मेरी  यादें, मेरी  ऑंखें
भुला  दो  गे

मैं  कहता  हूँ
कभी  इस   बात  पर  सोचा  नहीं  मैं ने
अगर  इक  पल  को  भी  सोचूँ   तो
साँसें  रुकने  लगती  हैं

वो  कहती  है  तुम्हें  मुझ से
मोहब्बत  इस  कदर  क्यों  है
के  मैं  इक  आम  सी  लड़की
तुम्हें  क्यों  खास  लगती  हूँ

मैं  कहता  हूँ
कभी  खुद  को  मेरी  आँखों  से  तुम  देखो
मेरी  दीवानगी  क्यों  है
ये   खुद  ही  जान  जाओ  गी

वो  कहती  है
मुझे  वारफ्तगी  से  देखते  क्यों  हो
के  मैं  खुद  को  बहुत
किमती  महसूस  करती  हूँ

मैं  कहता  हूँ
मता-ए-जां  बहुत अनमोल  होती  है
तुम्हें  जब  देखता  हूँ  जिन्दगी
महसूस  करता  हूँ

वो  कहती  है  मुझे अल्फाज़ के जुगनू  नहीं  मिलते
के  तुम्हें  बता  सकूं
के   दिल  में  मेरे
कितनी  मुहब्बत  है

मैं  कहता  हूँ
मुहब्बत  तो  निघाहों से  झलकती  है
तुम्हारी  खामोसी  मुझसे
तुम्हारी  बात  करती  हैं

वो  कहती  है
बताओ  न  किस  को  खोने  से  डरते  हो
बताओ  कौन  है  वो  जिसे
ये  मौसम  बुलातें  हैं

मैं कहता  हूँ
यह  मेरी  शाएरी  है  आइना  दिल  का
ज़रा  देखो  बताओ  क्या
तुम्हें  इस  में  नज़र  आया

वो  कहती  है
आतिफ  जी  बहुत  बातें  बनाते  हो
मगर  सच  है  ये  बातें
बहुत  ही  शाद  रखती  हैं

मैं  कहता  हूँ
यह  सब  बातें  ये  फशाने  इक  बहाना  है
के  पल  कुछ  जिंदगानी  के
तुम्हारे  साथ  कट  जाएँ

फिर  उस  के  बाद  ख़ामोशी  का
दिलकश  रक्स  होता  है
निगाहें   बोलती  है  और
लब  खामोश  रहते  हैं

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1 वारफ्तगी=खोया-खोयापन; 2 बदगुमानी=किसी की ओर से बुरा खयाल
3 खद्शे=डर; 4 मता-ए-जां=जान की कीमत; 5 शाद=खुश; 6 रक्स=नृत्य

                                                     

Saturday, February 26, 2011

चाँद तनहा है Chand Tanha Hai

Best Poetry Collection in Hindi
 चाँद  तनहा  है  आसमान  तनहा
दिल  मिला  है  कहाँ  कहाँ  तनहा

बुझ  गयी  आस  छुप  गया  तारा
थर  थराता  रहा  धुआं  तनहा

ज़िन्दगी  क्या  इसी  को  कहते  हैं
जिस्म  तनहा  है  और  जां  तनहा

हमसफ़र  कोई  गर  मिले  भी  कहीं
दोनों  चलते  रहे  तनहा  तनहा

जलती  बुझती  सी  रोशनी  के  परे
सिमटा  सिमटा  सा  एक  मकां तनहा

राह  देखा  करेगा  सदियों  तक
छोड़  जायेंगे  ये  जहां  तनहा
              
                                                      -मीना कुमारी

Wednesday, December 22, 2010

ये इश्क नहीं आसां एक आग का दरिया है Yeh Ishq Nahi Aasan Aik Aag Ka Dariya Hai

वो  बोले 

ये  इश्क  नहीं  आसां , इतना  तो  समझ  लीजिये
एक  आग  का  दरिया  है , और  डूब  के  जाना  है

मैंने  कहा

 मासूम  सी  मोहब्बत  का  बस  इतना  सा   फ़साना  है
कागज  की  हवेली  है , बारिश  का  ज़माना  है

क्या  शर्त -ए -मोहब्बत  है , क्या  शर्त -ए -ज़माना  है 
आवाज़  भी  जख्मी  है  और  वो  गीत  भी  गाना  है

उस 
पार  उतरने  की  उम्मीद  बहुत  कम  है
कश्ती  भी  पुरानी  है , तूफ़ान  भी  आना  है

समझे  या  न  समझे  वो  अंदाज़ -ए -मोहब्बत  का
भीगी  हुई  आँखों  से  एक  शेर  सुनाना  है

भोली  सी  अदा , कोई  फिर  इश्क  की  जिद  पर  है
फिर  आग  का  दरिया  है  और  डूब  ही  जाना  है