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Saturday, May 14, 2011

ये तो नहीं कि ग़म नहीं ye toh nahin ki gam nahin

 ये तो नहीं कि ग़म नहीं
हाँ! मेरी आँख नम नहीं

तुम भी तो तुम नहीं हो आज
हम भी तो आज हम नहीं

अब न खुशी की है खुशी
ग़म भी अब तो ग़म नहीं

मेरी नशिस्त है ज़मीं
खुल्द नहीं इरम नहीं

क़ीमत-ए-हुस्न दो जहाँ
कोई बड़ी रक़म नहीं

लेते हैं मोल दो जहाँ
दाम नहीं दिरम नहीं

सोम-ओ-सलात से फ़िराक़
मेरे गुनाह कम नहीं

मौत अगरचे मौत है
मौत से ज़ीस्त कम नहीं 

                           -फ़िराक़ गोरखपुरी

Friday, March 25, 2011

हुस्न भी था उदास HUSSAN BHI THA UDAS

हुस्न भी था उदास,उदास ,शाम भी थी धुआं-धुआं  ,
याद सी आके रह गयी दिल को कई कहानियां |

छेड़ के दास्तान-ए-गम अहले वतन के दरमियाँ ,
हम अभी बीच में थे और बदल गई ज़बां |

सरहद-ए-ग़ैब तक तुझे साफ मिलेंगे नक्श-ए-पा ,
पूछना यह फिरा हूं मैं तेरे लिए कहां- कहां |

रंग जमा के उठ गई कितने तमददुनो की बज्म ,
याद नहीं ज़मीन को , भूल गया है आसमां |

जिसको भी देखिए वहीँ बज़्म में है गज़ल सरा,
छिड़ गयी दास्तान-ए-दिल बहदीस-ए-दीगरा |

बीत गए है लाख जुग सूये वतन चले हुए ,
पहुंची है आदमी की ज़ात चार कदम कशां-कशां |

जैसे से खिला हुआ गुलाब चांद के पास लहलहाए
रात वह दस्त-ए-नाज़ में जाम-ए-निशात-ए-अरगवां |

मुझको फिराक़ याद है पैकर-ए-रंग-ओ-बूए दोस्त ,
पांव से ता जबी-ए-नाज , मेहर फशां-ओ-मह चुका |
                                                                -फ़िराक़ गोरखपुरी
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अहले वतन=देशवासी ; सरहद-ए-ग़ैब=अज्ञात सीमा ;
नक्श-ए-पा=पांव के निशान ; तमददुनो=सभ्यताओं ;
सरा=गायक ; बहदीस-ए-दीगरा=दूसरों की बातों के साथ
सूये=तरफ,ओर ;  कशां-कशां=खिंचे-खिंचे ;दस्त-ए-नाज़=नाजुक हाथ;
जाम-ए-निशात-ए-अरगवां=उनके हाथों में शराब क जाम बिकुल ऐसे
ही है जी चांद के पास खिला हुआ गुलाब ; पैकर-ए-रंग-ओ-बूए दोस्त=
महबूब की छवि-रंग और सुगंध ; जबी-ए-नाज=पांव से माथे तक
फशां-ओ-मह चुका=सूरज और चांद की तरह रोशनी फूट रही है |