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Saturday, December 24, 2016
Saturday, December 17, 2016
गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं Garmi-e-hasrat-e-nakam se jal jate hain - Qateel Shifai
गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं
हम चरागों की तरह शाम से जल जाते हैं
बच निकलते हैं अगर अतीह-ए-सय्याद से हम
शोला-ए-आतिश-ए-गुलफाम से जल जाते हैं
खुदनुमाई तो नहीं शेवा-ए-अरबाब-ए-वफ़ा
जिन को जलना हो वो आराम से जल जाते हैं
शमा जिस आग में जलती है नुमाइश क लिए
हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं
जब भी आता है मेरा नाम तेरे नाम के साथ
जाने क्यूँ लोग मेरे नाम से जल जाते हैं
रब्ता बहम पे हमें क्या ना कहेंगे दुश्मन
आशना जब तेरे पैगाम से जल जाता है
- क़तील शिफ़ाई
बच निकलते हैं अगर अतीह-ए-सय्याद से हम
शोला-ए-आतिश-ए-गुलफाम से जल जाते हैं
खुदनुमाई तो नहीं शेवा-ए-अरबाब-ए-वफ़ा
जिन को जलना हो वो आराम से जल जाते हैं
शमा जिस आग में जलती है नुमाइश क लिए
हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं
जब भी आता है मेरा नाम तेरे नाम के साथ
जाने क्यूँ लोग मेरे नाम से जल जाते हैं
रब्ता बहम पे हमें क्या ना कहेंगे दुश्मन
आशना जब तेरे पैगाम से जल जाता है
- क़तील शिफ़ाई
Friday, December 16, 2016
Thursday, December 15, 2016
तुम जाओ हम से दूर तो एक काम कर जाना Tum jao hum se door to Ek kaam kar jana
तुम जाओ हम से दूर तो एक काम कर जाना
कुछ पल अपने हमारे नाम कर जाना
अगर आ जाए मौत हमें आप क आने से पहले
तो आ कर मेरे जनाज़े का एहतराम कर जाना
ना रोना इश क़दर कि
तकलीफ़ हो हमें
मौत को भी मज़ाक़ समझ कर अंजन बन जाना
मैं एक दिन सो जाऊं गा सदा क लिए
फिर मुझे बेवफा कह कर बदनाम कर जाना
जो गुज़रो मेरी क़बर से तो नज़रें न फेरना
अजनबी ही बन के दुआ सलाम कर जाना
मैं एक ढ़लती हुई शाम उसके नाम लिख रहा हूँ Main ek ḍhaltee hui shaam usake naam likh raha hoon
मैं एक ढ़लती हुई शाम उसके नाम लिख रहा हूँ।
एक प्यार भरे दिल का कत्लेआम लिख रहा हूँ।
एक प्यार भरे दिल का कत्लेआम लिख रहा हूँ।
ता उम्र मैं करता रहा जिस शाम उसका चर्चा,
मैं आज उसी शाम को नाकाम लिख रहा हूँ ।
सोचा था न जाऊँगा जहाँ उम्र भर कभी भी,
उस मैकदे में अब तो हर शाम दिख रहा हूँ ।
हाँसिल न हुआ जिसमें बस गम के शिवा कुछ भी,
मैं उस दीवानेपन का अंजाम लिख रहा हूँ ।
थी हीरे सी चमक मुझमें प्यार के उजाले में,
नफरत के अंधेरों में पथ्थर सा दिख रहा हूँ ।
दुनिया की निगाहों से जिसे था छुपाया करता,
उस बेवफा का नाम सरेआम लिख रहा हू ।
Friday, December 2, 2016
किसी की आँख में आँसू कहीं ठहरा हुआ होगा Kisi ki aankh mein aansoo kahin ṭhahara hua hoga
किसी की आँख में आँसू, कहीं ठहरा हुआ होगा
यकीनन दर्द का दरिया भी वहीँ सूखा हुआ होगा
जमाने की रवायत ने जुदा तुमसे किया मुझको
भरी दुनियाँ लुटी होगी, बड़ा सदमा हुआ होगा
धुँधले पड़े होंगे वो 'अक्स' जो कभी दिल में थे
वक्त की चोट से आईना-ए-दिल चटका हुआ होगा
बना तस्वीर यादों की, लिखे वो खून से गजलें
लिखे खत थे कभी उसने, उन्हें पढता हुआ होगा
कहीं मिल जाए भूले से, न पहचाने मुझे अब वो
उसकी याद का आँसू, कहीं गिरता हुआ होगा
जमाने की रवायत ने जुदा तुमसे किया मुझको
भरी दुनियाँ लुटी होगी, बड़ा सदमा हुआ होगा
धुँधले पड़े होंगे वो 'अक्स' जो कभी दिल में थे
वक्त की चोट से आईना-ए-दिल चटका हुआ होगा
बना तस्वीर यादों की, लिखे वो खून से गजलें
लिखे खत थे कभी उसने, उन्हें पढता हुआ होगा
कहीं मिल जाए भूले से, न पहचाने मुझे अब वो
उसकी याद का आँसू, कहीं गिरता हुआ होगा
Sunday, November 27, 2016
छोटी सी ज़िंदगी है हर बात में खुश रहो chhoti si zindagi hai har baat mein khus raho
छोटी सी ज़िंदगी है
हर बात में खुश रहो
जो चेहरा पास ना हो
उसकी आवाज में खुश रहो
कोई रूठा हो तुमसे
उसके इस अन्दाज में खुश रहो
जो लौट कर नहीं आने वाले
उन लम्हों की याद में खुश रहो
कल किसने देखा है
अपने आज में खुश रहो
खुशियों का इन्तजार किस लिए
दूसरों की मुस्कान में खुश रहो
क्यों तड़पते हो हर पल किसी के साथ को
कभी-कभी अपने आप में खुश रहो
छोटी सी तो ज़िंदगी है
हर हाल में खुश रहो
हर बात में खुश रहो
जो चेहरा पास ना हो
उसकी आवाज में खुश रहो
कोई रूठा हो तुमसे
उसके इस अन्दाज में खुश रहो
जो लौट कर नहीं आने वाले
उन लम्हों की याद में खुश रहो
कल किसने देखा है
अपने आज में खुश रहो
खुशियों का इन्तजार किस लिए
दूसरों की मुस्कान में खुश रहो
क्यों तड़पते हो हर पल किसी के साथ को
कभी-कभी अपने आप में खुश रहो
छोटी सी तो ज़िंदगी है
हर हाल में खुश रहो
Sunday, November 20, 2016
Tuesday, November 15, 2016
मार ही डाल मुझे चश्म-ए-अदा से पहले Maar hi Daal mujhe chasm-e-adaa se pahale
मार ही डाल मुझे चश्म-ए-अदा से पहले
अपनी मंजिल को पहुँच जाऊँगा कज़ा से पहले
इक नज़र देख लूं आ जाओ कज़ा से पहले
तुम से मिलने की तमन्ना है खुदा से पहले
हश्र के रोज़ मैं पूछूंगा खुदा से पहले
तूने रोका नहीं क्यों मुझको खता से पहले
ऐ मेरी मौत ठहर उनको जरा आने दे
जहर का जाम न दे मुझको दवा से पहले
हाथ पहुंचे भी न थे जुल्फ दोता तक मोमिन
हथकड़ी डाल दी ज़ालिम ने खता से पहले
- मोमिन ख़ाँ 'मोमिन'
___________________________________________
कज़ा=मौत; हश्र = क़यामत का दिन; दोता=मोड़
अपनी मंजिल को पहुँच जाऊँगा कज़ा से पहले
इक नज़र देख लूं आ जाओ कज़ा से पहले
तुम से मिलने की तमन्ना है खुदा से पहले
हश्र के रोज़ मैं पूछूंगा खुदा से पहले
तूने रोका नहीं क्यों मुझको खता से पहले
ऐ मेरी मौत ठहर उनको जरा आने दे
जहर का जाम न दे मुझको दवा से पहले
हाथ पहुंचे भी न थे जुल्फ दोता तक मोमिन
हथकड़ी डाल दी ज़ालिम ने खता से पहले
- मोमिन ख़ाँ 'मोमिन'
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कज़ा=मौत; हश्र = क़यामत का दिन; दोता=मोड़
Tuesday, January 10, 2012
तुम जानो, तुमको ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो Tum jaano tumko gair se jo rasm-o-raah ho
तुम जानो, तुमको ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो
मझको भी पूछते रहो तो क्या गुनाह हो
बचते नहीं मुवाखज़:-ए-रोज़े हश्र से
कातिल अगर रक़ीब है तो तुम गवाह हो
क्या वो: भी बेगुनह: कुश-ओ-हक़ ना शानस है?
माना के: तुम बशर नहीं, खुरशीद-ओ-माह हो
उभरा हुआ निक़ाब में है उनके एक तार
मरता हूँ मैं के: ये: न: किसी की निगाह हो
जब मैकद: छुटा तो फिर अब क्या जगह की कैद
मस्जिद हो, मदरस: हो, कोई खानकाह हो
सुनते हैं जो बहिश्त की तअरीफ़ सब दुरुस्त
लेकिन ख़ुदा करे वो: तेरा जल्व:गाह हो
'ग़ालिब' भी गर न: हो, तो कुछ ऐसा ज़रर नहीं
दुनिया हो यारब, और मेरा बादशाह हो
-मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ 'ग़ालिब'
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रस्म-ओ-राह=सम्बन्ध; मुवाखज़:=उत्तरदायित्व; रोज़े हश्र=प्रलय का दिन; बेगुनह: कुश=निर्दोशियों
का वधक(मारने वाला); ओ=और; हक़ ना शानस=सत्य को न जानने वाला; बशर=मानव;
खुरशीद-ओ-माह=सूर्य, और चन्द्रमा; निक़ाब=नकाब; कैद=यहाँ कैद से अभिप्राय प्रतिबन्ध से है;
मैकद:=मदिरालय; मदरस:=मदरसा(पाठशाला); खानकाह=आश्रम; बहिश्त=स्वर्ग; तअरीफ़=प्रशंसा;
दुरुस्त=ठीक; जल्व:गाह=दृश्यस्थल; ज़रर=हानि(घाटा)
मझको भी पूछते रहो तो क्या गुनाह हो
बचते नहीं मुवाखज़:-ए-रोज़े हश्र से
कातिल अगर रक़ीब है तो तुम गवाह हो
क्या वो: भी बेगुनह: कुश-ओ-हक़ ना शानस है?
माना के: तुम बशर नहीं, खुरशीद-ओ-माह हो
उभरा हुआ निक़ाब में है उनके एक तार
मरता हूँ मैं के: ये: न: किसी की निगाह हो
जब मैकद: छुटा तो फिर अब क्या जगह की कैद
मस्जिद हो, मदरस: हो, कोई खानकाह हो
सुनते हैं जो बहिश्त की तअरीफ़ सब दुरुस्त
लेकिन ख़ुदा करे वो: तेरा जल्व:गाह हो
'ग़ालिब' भी गर न: हो, तो कुछ ऐसा ज़रर नहीं
दुनिया हो यारब, और मेरा बादशाह हो
-मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ 'ग़ालिब'
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रस्म-ओ-राह=सम्बन्ध; मुवाखज़:=उत्तरदायित्व; रोज़े हश्र=प्रलय का दिन; बेगुनह: कुश=निर्दोशियों
का वधक(मारने वाला); ओ=और; हक़ ना शानस=सत्य को न जानने वाला; बशर=मानव;
खुरशीद-ओ-माह=सूर्य, और चन्द्रमा; निक़ाब=नकाब; कैद=यहाँ कैद से अभिप्राय प्रतिबन्ध से है;
मैकद:=मदिरालय; मदरस:=मदरसा(पाठशाला); खानकाह=आश्रम; बहिश्त=स्वर्ग; तअरीफ़=प्रशंसा;
दुरुस्त=ठीक; जल्व:गाह=दृश्यस्थल; ज़रर=हानि(घाटा)
Saturday, June 4, 2011
अजब नशात से, जल्लाद के चले हैं हम आगे Ajab nashat se jallad ke chale hain hum aage-Galib
अजब नशात से, जल्लाद के चले हैं हम आगे
के: अपने साये से सर, पाँव से है दो कदम आगे
कज़ा ने था मुझे चाहा ख़राबे बादः-ए-उल्फ़त
फ़क़त 'ख़राब' लिखा, बस नः चल सका कलम आगे
ग़मे ज़मानः ने झाड़ी नाश्ते इश्क़ की मस्ती
वगर्न: हम भी उठाते थे लज्ज़ते अलम आगे
खुदा के वास्ते दाद इस जुनूने शौक़ की देना
के उसके दर पे: पहोंचते हैं नामःबार से हम आगे
ये: उम्र भर जो परीशानियाँ उठाई हैं हमने
तुम्हारे आइयो ऐ तुर्र: हाए ख़म बः ख़म, आगे
दिल-ओ-जिगर में परअफशाँ जो एक मौज:-ए-खूँ है
हम अपने ज़ओम में समझे हुए थे उसको दम आगे
क़सम जनाज़े पे: आने की मेरे खाते हैं 'ग़ालिब'
हमेशा: खाते थे जो मेरी जान की क़सम, आगे
-मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ 'ग़ालिब'
_____________________________________________________________________________
नशात=हर्ष; कज़ा=मौत; ख़राबे बादः-ए-उल्फ़त=मदिरा की चाहत मे नष्ट; ग़मे ज़मानः=दुनिया के दुःख;
नाश्ते इश्क़=प्रेम का हर्ष (खुसी); लज्ज़ते अलम=दुखों का आनंद; नामःबार=डाकिया;
तुर्र: हाए ख़म बः ख़म=घूँघरियली बालों की लटें; परअफशाँ=व्याकुल (बेचैन);
मौज:-ए-खूँ=खून की लहर; ज़ओम=घमंड; दम=सांस;
के: अपने साये से सर, पाँव से है दो कदम आगे
कज़ा ने था मुझे चाहा ख़राबे बादः-ए-उल्फ़त
फ़क़त 'ख़राब' लिखा, बस नः चल सका कलम आगे
ग़मे ज़मानः ने झाड़ी नाश्ते इश्क़ की मस्ती
वगर्न: हम भी उठाते थे लज्ज़ते अलम आगे
खुदा के वास्ते दाद इस जुनूने शौक़ की देना
के उसके दर पे: पहोंचते हैं नामःबार से हम आगे
ये: उम्र भर जो परीशानियाँ उठाई हैं हमने
तुम्हारे आइयो ऐ तुर्र: हाए ख़म बः ख़म, आगे
दिल-ओ-जिगर में परअफशाँ जो एक मौज:-ए-खूँ है
हम अपने ज़ओम में समझे हुए थे उसको दम आगे
क़सम जनाज़े पे: आने की मेरे खाते हैं 'ग़ालिब'
हमेशा: खाते थे जो मेरी जान की क़सम, आगे
-मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ 'ग़ालिब'
_____________________________________________________________________________
नशात=हर्ष; कज़ा=मौत; ख़राबे बादः-ए-उल्फ़त=मदिरा की चाहत मे नष्ट; ग़मे ज़मानः=दुनिया के दुःख;
नाश्ते इश्क़=प्रेम का हर्ष (खुसी); लज्ज़ते अलम=दुखों का आनंद; नामःबार=डाकिया;
तुर्र: हाए ख़म बः ख़म=घूँघरियली बालों की लटें; परअफशाँ=व्याकुल (बेचैन);
मौज:-ए-खूँ=खून की लहर; ज़ओम=घमंड; दम=सांस;
Thursday, October 28, 2010
एहसास Ehsas
तेरे दुःख और दर्द का मुझपर भी हो ऐसा असर
तू रहे भूखा तो , मुझसे भी न खाया जाए
तेरी मंजिल को अगर रास्ता न मै दिखला सकूँ
मुझसे भी मेरी मंजिल , को न पाया जाए
तेरे तपते शीश को गर ,छाँव न दिखला सकूँ
मेरे सर की छाँव से ,सूरज सहा न जाए
तेरे अरमानो को गर मै , पंख न लगाव सकूँ
मेरी आशाओं के पैरों से चला न जाये
तेरे अंधियारे घर को रोशन अगर न कर सकूँ
मेरे आंगन के दिए से भी जला न जाये
तेरे घावों को अगर , मरहम से न सहला सकूँ
मेरे नन्हे जख्म को बरसों भरा न जाए
आग बुझती है यहाँ ,गंगा में भी झेलम में भी
कोई बतलाये कहाँ , जाकर नहाया जाए
तू रहे भूखा तो , मुझसे भी न खाया जाए
तेरी मंजिल को अगर रास्ता न मै दिखला सकूँ
मुझसे भी मेरी मंजिल , को न पाया जाए
तेरे तपते शीश को गर ,छाँव न दिखला सकूँ
मेरे सर की छाँव से ,सूरज सहा न जाए
तेरे अरमानो को गर मै , पंख न लगाव सकूँ
मेरी आशाओं के पैरों से चला न जाये
तेरे अंधियारे घर को रोशन अगर न कर सकूँ
मेरे आंगन के दिए से भी जला न जाये
तेरे घावों को अगर , मरहम से न सहला सकूँ
मेरे नन्हे जख्म को बरसों भरा न जाए
आग बुझती है यहाँ ,गंगा में भी झेलम में भी
कोई बतलाये कहाँ , जाकर नहाया जाए
Wednesday, October 27, 2010
हर एक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है Har Ek Baat Pe Kahte Ho Tum ke Tu Kya Hai
हर एक बात पे कहते हो तुम, के तू क्या है
तुम्ही कहो के ये अंदाजे गुफ्तगू क्या है
न शोले में ये करिश्म न बर्क में ये अदा
कोई बताओ के वो शोखे तन्द्खु क्या है
ये रश्क है के वो होता है हमसुखन तुमसे
वगर्न खौफे बदआमोजी -ए-अदू क्या है
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारे जैब को अब हाजते रफू क्या है
जलता है जिस्म जहाँ, दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब रख, जुस्तजू क्या है
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
वो चीज जिसके लिए हो हमको बहिश्त अज़ीज़
सिवाय बाद-ए-गुलफामे मुश्कबू , क्या है
पियूँ शराब अगर खुम भी देख लूँ दो चार
ये शीशा-ओ-कदह-ओ-कूज ओ सुबू क्या है
रही न ताकते गुफ्तार , और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पर कहिये के आरजू क्या है
हुआ है शाह का मुशाहिब,फिरे है इतराता
वगर्न शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है
-असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब
____________________________________________________________
अंदाजे गुफ्तगू=बात करने का ढंग; बर्क=बिजली; शोखे तन्द्खु=क्रुध स्वभाव की
चंचलता; रश्क=इर्ष्या; हमसुखन=बात करना; खौफे बदआमोजी -ए-अदू=शत्रु की
अबभद्र शिक्षा का डर; हाजते रफू=रफू की आवश्यकता; बहिश्त=स्वर्ग; अज़ीज़=
प्रिय; बाद-ए-गुलफामे मुश्कबू=फूलों जैसे रंग एंव मुश्क की सुगंध के सामान मदिरा;
खुम=शराब का मटका; शीशा-ओ-कदह-ओ-कूज ओ सुबू=बोतल,प्याला,एंव कुल्हड़,मटका
गुफ्तार=बात करने की शक्ति; शाह=बादशाह; मुशाहिब=सभासद; आबरू=इज्जत;
तुम्ही कहो के ये अंदाजे गुफ्तगू क्या है
न शोले में ये करिश्म न बर्क में ये अदा
कोई बताओ के वो शोखे तन्द्खु क्या है
ये रश्क है के वो होता है हमसुखन तुमसे
वगर्न खौफे बदआमोजी -ए-अदू क्या है
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारे जैब को अब हाजते रफू क्या है
जलता है जिस्म जहाँ, दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब रख, जुस्तजू क्या है
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
वो चीज जिसके लिए हो हमको बहिश्त अज़ीज़
सिवाय बाद-ए-गुलफामे मुश्कबू , क्या है
पियूँ शराब अगर खुम भी देख लूँ दो चार
ये शीशा-ओ-कदह-ओ-कूज ओ सुबू क्या है
रही न ताकते गुफ्तार , और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पर कहिये के आरजू क्या है
हुआ है शाह का मुशाहिब,फिरे है इतराता
वगर्न शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है
-असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब
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अंदाजे गुफ्तगू=बात करने का ढंग; बर्क=बिजली; शोखे तन्द्खु=क्रुध स्वभाव की
चंचलता; रश्क=इर्ष्या; हमसुखन=बात करना; खौफे बदआमोजी -ए-अदू=शत्रु की
अबभद्र शिक्षा का डर; हाजते रफू=रफू की आवश्यकता; बहिश्त=स्वर्ग; अज़ीज़=
प्रिय; बाद-ए-गुलफामे मुश्कबू=फूलों जैसे रंग एंव मुश्क की सुगंध के सामान मदिरा;
खुम=शराब का मटका; शीशा-ओ-कदह-ओ-कूज ओ सुबू=बोतल,प्याला,एंव कुल्हड़,मटका
गुफ्तार=बात करने की शक्ति; शाह=बादशाह; मुशाहिब=सभासद; आबरू=इज्जत;
Tuesday, October 26, 2010
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते है ye hum jo hijr mein diwar-o-dar ko dekhte hain
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते है
कभी सबा को कभी नामःबार को देखते है
वो आए घर में हमारे,खुदा की कुदरत है
कभी हम उनको,कभी अपने घर को देखते है
नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाजू को
ये लोग क्यूं मेरे ज़ख़्म जिगर को देखते है
तेरे जवाहिरे तर्फे कुल को क्या देखें
हम औजे तअले लाल-ओ-गुहार को देखते है
जहाँ तेरा नक़्शे कदम देखते है
खियाबां-खियाबां इरम देखते है
दिल अशुफ्तगां खाले कुंजे दहन के
सुवैदा में सैरे अदम देखते हैं
तेरे सरू कामत से यक कद्दे आसद
क़यामत के फ़ितने को कम देखते हैं
तमाश के ऐ महवे आईन दारी!
तुझे किस तम्मना से हम देखते है
सुरागे तुफे नाल ले दागे दिल से
के शबरौ का नक़्शे कदम देखते है
बनाकर हम फकीरों का भेस 'ग़ालिब' !
तमाशः-ए-अहले करम देखते है
-असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब
_____________________________________________
हिज्र=विरह(जुदाई), सबा=ठंडी हवा, नामःबार=पत्र वाहक(डाकिया)
दस्त-ओ-बाजू=हाथ और पाँव, जवाहिरे तर्फे कुल=टोपी में टंके हीरे,
औजे तअले लाल-ओ-गुहार=हीरे जवाहरात के भाग्य की प्रतिष्ठा,
खियाबां-खियाबां=फूलों की क्यारी, इरम=स्वर्ग, दिल अशुफ्तगां=दीवाना दिल,
खाले कुंजे दहन=मुह के कोने का तिल, सुवैदा=काला धब्बा(यहाँ तात्पर्य आँख की
पुतली के तिल से है), सैरे अदम=यम लोक की सैर, सरू कामत=इतना लम्बा के
सरो वृक्ष के सामान, कद्दे आसद=हज़रत आदम(पहला मानव)का कद, फ़ितने=उपद्रव,
महवे आईन दारी=आइना देखने में लीन, तुफे नाल=आर्तनाद(धिक्कार), शबरौ=रात्रि में
चलने वाला, करम=कृपालु,
कभी सबा को कभी नामःबार को देखते है
वो आए घर में हमारे,खुदा की कुदरत है
कभी हम उनको,कभी अपने घर को देखते है
नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाजू को
ये लोग क्यूं मेरे ज़ख़्म जिगर को देखते है
तेरे जवाहिरे तर्फे कुल को क्या देखें
हम औजे तअले लाल-ओ-गुहार को देखते है
जहाँ तेरा नक़्शे कदम देखते है
खियाबां-खियाबां इरम देखते है
दिल अशुफ्तगां खाले कुंजे दहन के
सुवैदा में सैरे अदम देखते हैं
तेरे सरू कामत से यक कद्दे आसद
क़यामत के फ़ितने को कम देखते हैं
तमाश के ऐ महवे आईन दारी!
तुझे किस तम्मना से हम देखते है
सुरागे तुफे नाल ले दागे दिल से
के शबरौ का नक़्शे कदम देखते है
बनाकर हम फकीरों का भेस 'ग़ालिब' !
तमाशः-ए-अहले करम देखते है
-असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब
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हिज्र=विरह(जुदाई), सबा=ठंडी हवा, नामःबार=पत्र वाहक(डाकिया)
दस्त-ओ-बाजू=हाथ और पाँव, जवाहिरे तर्फे कुल=टोपी में टंके हीरे,
औजे तअले लाल-ओ-गुहार=हीरे जवाहरात के भाग्य की प्रतिष्ठा,
खियाबां-खियाबां=फूलों की क्यारी, इरम=स्वर्ग, दिल अशुफ्तगां=दीवाना दिल,
खाले कुंजे दहन=मुह के कोने का तिल, सुवैदा=काला धब्बा(यहाँ तात्पर्य आँख की
पुतली के तिल से है), सैरे अदम=यम लोक की सैर, सरू कामत=इतना लम्बा के
सरो वृक्ष के सामान, कद्दे आसद=हज़रत आदम(पहला मानव)का कद, फ़ितने=उपद्रव,
महवे आईन दारी=आइना देखने में लीन, तुफे नाल=आर्तनाद(धिक्कार), शबरौ=रात्रि में
चलने वाला, करम=कृपालु,
Sunday, October 24, 2010
हुस्ने मह गरचे ब हंगामें कमाल अच्छा है Husne mah garche ba hangame kamaal achha hai
हुस्ने मह गरचे ब हंगामें कमाल अच्छा है
उससे मेरा माहे खुरशीद जमाल अच्छा है
बोस देते नहीं और दिल पे है हर लहज निगाह
जी में कहते हैं के मुफ्त आए तो माल अच्छा है
और बाजार से ले आए,अगर टूट गया
सागरे जम से मेरा जामे सिफाल अच्छा है
बेतलब दें तो मजा उसमें सिवा मिलता है
वो गदा, जिसको न हो खूं-ए-सवाल, अच्छा है
उनके देखे से आ जाती है मुँह पर रौनक
वो समझते है के बीमार का हाल अच्छा है
देखिए,पाते हैं उशशाक बुतों से क्या फैज़
इक बिरहमन ने कहा है के ये साल अच्छा है
हम सुखन तेशो ने 'फरहाद' को 'शीरीं' से किया
जिस तरह का के किसी में हो कमाल अच्छा है
क़तर दरिया में जो मिल जाए,तो दरिया हो जाए
काम अच्छा है वो,जिसका के मआल अच्छा है
खिज्र सुल्तां को रखे खलिके अकबर सरसब्ब्ज
शाह के बाग में ये ताज निहाल अच्छा है
हमको मअलूम है जन्नत की हकीक़त, लेकिन
दिल के खुस रखे को 'ग़ालिब' ये ख्य अच्छा है
-असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब
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हुस्ने मह=चन्द्रमा का सौंदर्य , हंगामें कमाल=पूर्णिमा के समय ,
माहे खुरशीद जमाल=यहाँ पर तात्पर्य प्रेमिका की सुन्दरता से है ( मह=चन्द्रमा,
खुरशीद=सूर्य,जमाल=सुन्दरता), बोस=चुम्बन , सागरे जम=जमशेद का जाम(जमशेद
-इरान का वह बादशाह जिसने एक ऐसा जाम बनवाया था जिसमे सरे संसार को देखा
जा सकता था) , जामे सिफाल=मिट्टी का प्याला , बेतलब=बिनामंगे ,सिवा=अधिक,
गदा=भिखारी , खूं-ए-सवाल=मांगने की आदत
उससे मेरा माहे खुरशीद जमाल अच्छा है
बोस देते नहीं और दिल पे है हर लहज निगाह
जी में कहते हैं के मुफ्त आए तो माल अच्छा है
और बाजार से ले आए,अगर टूट गया
सागरे जम से मेरा जामे सिफाल अच्छा है
बेतलब दें तो मजा उसमें सिवा मिलता है
वो गदा, जिसको न हो खूं-ए-सवाल, अच्छा है
उनके देखे से आ जाती है मुँह पर रौनक
वो समझते है के बीमार का हाल अच्छा है
देखिए,पाते हैं उशशाक बुतों से क्या फैज़
इक बिरहमन ने कहा है के ये साल अच्छा है
हम सुखन तेशो ने 'फरहाद' को 'शीरीं' से किया
जिस तरह का के किसी में हो कमाल अच्छा है
क़तर दरिया में जो मिल जाए,तो दरिया हो जाए
काम अच्छा है वो,जिसका के मआल अच्छा है
खिज्र सुल्तां को रखे खलिके अकबर सरसब्ब्ज
शाह के बाग में ये ताज निहाल अच्छा है
हमको मअलूम है जन्नत की हकीक़त, लेकिन
दिल के खुस रखे को 'ग़ालिब' ये ख्य अच्छा है
-असदुल्ला खान मिर्जा ग़ालिब
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हुस्ने मह=चन्द्रमा का सौंदर्य , हंगामें कमाल=पूर्णिमा के समय ,
माहे खुरशीद जमाल=यहाँ पर तात्पर्य प्रेमिका की सुन्दरता से है ( मह=चन्द्रमा,
खुरशीद=सूर्य,जमाल=सुन्दरता), बोस=चुम्बन , सागरे जम=जमशेद का जाम(जमशेद
-इरान का वह बादशाह जिसने एक ऐसा जाम बनवाया था जिसमे सरे संसार को देखा
जा सकता था) , जामे सिफाल=मिट्टी का प्याला , बेतलब=बिनामंगे ,सिवा=अधिक,
गदा=भिखारी , खूं-ए-सवाल=मांगने की आदत







