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Saturday, December 24, 2016

बहुत दराज़ फ़साना है ये Bahut daraaz fasaanaa hai ye

Bahut daraaz fasaanaa hai ye

बहुत दराज़ फ़साना है ये
इक ज़ख्म बहुत पुराना है ये

कुछ रोग होते हैं लाइलाज़
इक ज़ख्म खा के जाना है ये

गीत विरह का उम्र भर ही
हमको बस अब गाना है ये

कुछ लोग मिलते हैं किस्मतों से
उस से बिछड़ के जाना है ये

है इश्क़ नहीं ये सब के लिए
"राज" हमने अब माना है ये

Thursday, December 15, 2016

तुम जाओ हम से दूर तो एक काम कर जाना Tum jao hum se door to Ek kaam kar jana

Tum jao hum se door to Ek kaam kar jana
तुम जाओ हम से दूर तो एक काम कर जाना
कुछ पल अपने हमारे नाम कर जाना

अगर आ जाए मौत हमें आप क आने से पहले
तो आ कर मेरे जनाज़े का एहतराम कर जाना

ना रोना इश क़दर कि तकलीफ़ हो हमें
मौत को भी मज़ाक़ समझ कर अंजन बन जाना

मैं एक दिन सो जाऊं गा सदा क लिए
फिर मुझे बेवफा कह कर बदनाम कर जाना

जो गुज़रो मेरी क़बर से तो नज़रें न फेरना
अजनबी ही बन के दुआ सलाम कर जाना

मैं एक ढ़लती हुई शाम उसके नाम लिख रहा हूँ Main ek ḍhaltee hui shaam usake naam likh raha hoon

Main ek ḍhaltee hui shaam usake naam likh raha hoon
मैं एक ढ़लती हुई शाम उसके नाम लिख रहा हूँ।
एक प्यार भरे दिल का कत्लेआम लिख रहा हूँ।

ता उम्र मैं करता रहा जिस शाम उसका चर्चा,
मैं आज उसी शाम को नाकाम लिख रहा हूँ ।

सोचा था न जाऊँगा जहाँ उम्र भर कभी भी,
उस मैकदे में अब तो हर शाम दिख रहा हूँ ।

हाँसिल न हुआ जिसमें बस गम के शिवा कुछ भी,
मैं उस दीवानेपन का अंजाम लिख रहा हूँ ।

थी हीरे सी चमक मुझमें प्यार के उजाले में,
नफरत के अंधेरों में पथ्थर सा दिख रहा हूँ ।

दुनिया की निगाहों से जिसे था छुपाया करता,
उस बेवफा का नाम सरेआम लिख रहा हू ।

Friday, December 2, 2016

किसी की आँख में आँसू कहीं ठहरा हुआ होगा Kisi ki aankh mein aansoo kahin ṭhahara hua hoga

 किसी की आँख में आँसू कहीं ठहरा हुआ होगा
किसी की आँख में आँसू, कहीं ठहरा हुआ होगा
यकीनन दर्द का दरिया भी वहीँ सूखा हुआ होगा

जमाने की रवायत ने जुदा तुमसे किया मुझको
भरी दुनियाँ लुटी होगी, बड़ा सदमा हुआ होगा

धुँधले पड़े होंगे वो 'अक्स' जो कभी दिल में थे
वक्त की चोट से आईना-ए-दिल चटका हुआ होगा

बना तस्वीर यादों की, लिखे वो खून से गजलें
लिखे खत थे कभी उसने, उन्हें पढता हुआ होगा

कहीं मिल जाए भूले से, न पहचाने मुझे अब वो
उसकी याद का आँसू, कहीं गिरता हुआ होगा

Tuesday, November 29, 2016

कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो Kathin hai rahguzar thodi dur sath chalo

कठिन-है-राह-गुज़र-थोड़ी-देर-साथ-चलो
कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो।
बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी देर साथ चलो।

तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो।

नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो।

ये एक शब की मुलाक़ात भी गनीमत है
किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो।

तवाफ़-ए-मंज़िल-ए-जाना हमें भी करना है
‘फ़राज़’ तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो।
                                             
                                                          - अहमद फ़राज़

Sunday, November 27, 2016

छोटी सी ज़िंदगी है हर बात में खुश रहो chhoti si zindagi hai har baat mein khus raho

chhoti-si-zindagi-hai-har-baat-mein-khus-raho
छोटी सी ज़िंदगी है
हर बात में खुश रहो

जो चेहरा पास ना हो
उसकी आवाज में खुश रहो

कोई रूठा हो तुमसे
उसके इस अन्दाज में खुश रहो

जो लौट कर नहीं आने वाले
उन लम्हों की याद में खुश रहो

कल किसने देखा है
अपने आज में खुश रहो

खुशियों का इन्तजार किस लिए
दूसरों की मुस्कान में खुश रहो

क्यों तड़पते हो हर पल किसी के साथ को
कभी-कभी अपने आप में खुश रहो

छोटी सी तो ज़िंदगी है
हर हाल में खुश रहो

Sunday, November 20, 2016

देखा पलट के उस ने के हसरत उसे भी थी Dekha palat ke us ne ke hasrat usay bi thi

 देखा पलट के उस ने के हसरत उसे भी थी
हम जिस पर मिट गए थे मुहब्बत उसे भी थी

चुप हो गया था देख कर वो भी इधर उधर
दुनिया से मेरी तरह शिकायत उसे भी थी

ये सोच कर अंधेरे मे गले से लगा लिया
रातों को जागने की आदत उसे भी थी

वो रो दिया मुझ को परेशान देख कर
उस दिन पता लगा के मेरी ज़रूरत उसे भी थी

Monday, October 24, 2011

बाज़ीचः-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे Bazeecha e Atfal Hai Duniya Mere Aage - Mirza Ghalib

बाज़ीचः-ए-अत्फ़ाल  है दुनिया मेरे आगे
होता है  शब-ओ-रोज़  तमाशा मेरे आगे

इक खेल है औरंगे-ए-सुलेमाँ मेरे नज़दीक
इक बात है  एजाज़े मसीहा मेरे आगे

जुज़ नाम, नहीं सूरते आलम मुझे मंजूर
जुज़ वहम  नहीं, हस्ति-ए-आशिया मेरे आगे

होता है निहाँ  गर्द में सहरा, मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे: दरिया मेरे आगे

मत पूछ के क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू  देख  के: क्या रंग  है तेरा मेरे आगे

सच कहते  हो, खुदबीन-ओ-खुदआरा  हूँ, न: क्यूँ हूँ ?
बैठा  है  बूते  आईन:  सीमा  मेरे  आगे

फिर  देखिए अन्दाज़े  गुलअफ्शानि-ए-गुफ़्तार
रखदे  कोई  पैमान:-ए-सहबा  मेरे  आगे

नफ़रत  का  गुमाँ  गुज़रे  है,  मैं रश्क से गुज़रा
क्यूँकर कहूँ, लो नाम  न: उनका  मेरे आगे

ईमाँ  मुझे  रोक है, जो खेंचे  है  मुझे कुफ्र
कअब:  मेरे  पीछे है कलीसा मेरे आगे

आशिक़ हूँ, पे: माशूक फ़रेबी है मेरा काम
मजनूँ  को  बुरा  कहती  है लैला मेरे आगे

खुश  होते  हैं, पर  वस्ल में यूँ  मर  नहीं  जाते !
आई  शबे  हिजराँ  की  तमन्ना  मेरे  आगे

है  मौजज़न  इक कुल्जुमे खूँ, काश ! यही हो
आता  है  अभी देखिए  क्या-क्या मेरे आगे

गो  हाथ  को  जुंबिश  नहीं, आखों में तो दम है
रहने  दो अभी  सगार-ओ-मीना  मेरे  आगे

हमपेश:-ओ-हम  मशराब-ओ-हमराज़  है  मेरा
'ग़ालिब' को बुरा क्यूँ  कहो अच्छा  मेरे आगे
                                                         -मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ  'ग़ालिब'

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बाज़ीचः-ए-अत्फ़ाल=बच्चों के खेल का मैदान;  शब-ओ-रोज़=दिन रात;  औरंगे-ए-सुलेमाँ='सुलेमान' अवतार का सिंहासन; एजाज़े मसीहा=ईसा(jesus) का चमत्कार;  जुज़(सिवा) नाम=नाम के अतिरिक्त;
सूरते आलम(संसार)=संसार रूप;  जुज़ वहम=भ्रम के सिवा;  हस्ति-ए-आशिया=वस्तुओं का अस्तित्व; निहाँ=गुप्त; गर्द=धूल; सहरा=जंगल; जबीं=माथा; ख़ाक=मिट्टी(धरती);
खुदबीन-ओ-खुदआरा=अभिमानता और खुद को अलंकृत करने वाला;  बूते  आईन:=प्रेमिका का आईन; सीमा=खास कर;  अन्दाज़े  गुलअफ्शानि-ए-गुफ़्तार =बातों से फूल बरसने के समान;
पैमान:-ए-सहबा=अंगूरों की शराब का प्याला;   गुमाँ=संभावना; रश्क=ईर्ष्या; ईमाँ=धर्म; कुफ्र=अधर्म(पाप); कअब:=काबा(मुसलमानो का तीर्थ स्थल );  कलीसा=गिरजा(ईसाईयों का पूजा स्थल);
माशूक फ़रेबी=धोका देने वाला;  वस्ल=मिलन; शबे  हिजराँ=विरह की रात्रि; मौजज़न=लहरें मारने वाला; कुल्जुमे खूँ=खून का दरिया;  जुंबिश=हिलना;  सगार-ओ-मीना=जाम और सुराही;
हमपेश:=जो कार्य मैं करूँ वही दूसरा करे; ओ=और;  हम  मशराब=मेरे ही स्वभाव का;
हमराज़=यहाँ  'भेदी' से अभीप्रयाय है;

Monday, October 10, 2011

ज़िक्र उस परीवश का, और फिर बयाँ अपना Jikra us parivash ka aur fir bayaan apna

ज़िक्र  उस  परीवश  का, और  फिर  बयाँ  अपना
बन  गया  रक़ीब  आखिर,  था  जो  राज़दाँ  अपना

मय  वो:  क्यूँ  बहुत  पीते  बज़्मे  ग़ैर  में  यारब !
आज  ही  हुआ  मंजूर  उन  को  इम्तिहाँ  अपना

मंज़र  इक  बुलन्दी  पर  और  हम  बना  सकते
अर्श  से  इधर  होता  काश  के  मकाँ  अपना

दे  वो: जिस  क़दर  ज़िल्लत,  हम  हँसी  में  टालेंगे
बारे  आशना  निकला  उनका  पासबाँ,  अपना

दर्दे  दिल  लिखूँ  कब  तक, जाऊँ  उनको  दिखला  दूँ
उंगलियाँ  फ़िगार  अपनी,  खाम: खूँ  चकाँ  अपना

घिसते  घिसते  मिट  जाता,  आपने  अबस  बदला
नंगे  सिज्द:  से  मेरे,  संगे  आस्ताँ  अपना

ता  करे  न  गम्माज़ी , कर  लिया  है  दुश्मन  को
दोस्त  की   शिकायत  में  हमने  हमज़बाँ  अपना

हम  कहाँ  के  दाना  थे,  किस  हुनर  में  यक्ता  थे
बेसबब  हुआ ‘ग़ालिब’ ! दुश्मन  आसमाँ  अपना
                                                           -मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ  'ग़ालिब'
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परीवश=सुन्दरी; रक़ीब=प्रतिद्वंदी(दुसमन);  राज़दाँ=भेद जानने  वाला; मय=शराब;  बज़्मे=गोष्ठी(महफ़िल);
अर्श=आकास; ज़िल्लत=अपमान;  पासबाँ=द्वारपाल(gatekeeper); फ़िगार=घायल; खाम: खूँ  चकाँ=खून से
भरा कलम; अबस=व्यर्थ; नंगे  सिज्द:=माथे का वह चिन्ह जो सजदः(सजदा)करते करते पड़ जाता है;
संगे  आस्ताँ=चौखट का पत्थर; गम्माज़ी=चुगली; हमज़बाँ=अपनी जैसी जुबान वाला,(यहाँ "समर्थक" से अभिप्राय है )
दाना=बुद्धिमान;  यक्ता=अद्वितीय(जिसके सामान दुनिया में कोई दूसरा न हो)



Sunday, August 14, 2011

ख़िरद मन्दो से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है Khirad mando se kya poochhoon ki meri ibtida kya hai.

Iqbal shayari in hindi
ख़िरद मन्दो  से  क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है
कि मैं इस फिक्र में रहता हूँ मेरी इन्तहा क्या है

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रिज़ा क्या है

नज़र आई  मुझे तक़दीर की गहराइयाँ इसमें
न पूछ ऐ हमनशी मुझसे वो चश्मे-सुर्मा-सा क्या है

नवाए-सुबह गाही ने जिगर खूँ कर दिया मेरा
खुदाया जिस खता की यह सज़ा है वो खता क्या है  

                                       - अल्लामा मुहम्मद 'इक़बाल'
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 ख़िरद=ज्ञानी ; इब्तिदा=आरंभ ; इन्तहा=अंत ; रिज़ा=भाग्य ; हमनशी=इच्छा ;
 चश्मे-सुर्मा=आँख का सुर्मा ; नवाए-सुबह=सुबह की आवाजें ; 

Friday, March 25, 2011

हुस्न भी था उदास HUSSAN BHI THA UDAS

हुस्न भी था उदास,उदास ,शाम भी थी धुआं-धुआं  ,
याद सी आके रह गयी दिल को कई कहानियां |

छेड़ के दास्तान-ए-गम अहले वतन के दरमियाँ ,
हम अभी बीच में थे और बदल गई ज़बां |

सरहद-ए-ग़ैब तक तुझे साफ मिलेंगे नक्श-ए-पा ,
पूछना यह फिरा हूं मैं तेरे लिए कहां- कहां |

रंग जमा के उठ गई कितने तमददुनो की बज्म ,
याद नहीं ज़मीन को , भूल गया है आसमां |

जिसको भी देखिए वहीँ बज़्म में है गज़ल सरा,
छिड़ गयी दास्तान-ए-दिल बहदीस-ए-दीगरा |

बीत गए है लाख जुग सूये वतन चले हुए ,
पहुंची है आदमी की ज़ात चार कदम कशां-कशां |

जैसे से खिला हुआ गुलाब चांद के पास लहलहाए
रात वह दस्त-ए-नाज़ में जाम-ए-निशात-ए-अरगवां |

मुझको फिराक़ याद है पैकर-ए-रंग-ओ-बूए दोस्त ,
पांव से ता जबी-ए-नाज , मेहर फशां-ओ-मह चुका |
                                                                -फ़िराक़ गोरखपुरी
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अहले वतन=देशवासी ; सरहद-ए-ग़ैब=अज्ञात सीमा ;
नक्श-ए-पा=पांव के निशान ; तमददुनो=सभ्यताओं ;
सरा=गायक ; बहदीस-ए-दीगरा=दूसरों की बातों के साथ
सूये=तरफ,ओर ;  कशां-कशां=खिंचे-खिंचे ;दस्त-ए-नाज़=नाजुक हाथ;
जाम-ए-निशात-ए-अरगवां=उनके हाथों में शराब क जाम बिकुल ऐसे
ही है जी चांद के पास खिला हुआ गुलाब ; पैकर-ए-रंग-ओ-बूए दोस्त=
महबूब की छवि-रंग और सुगंध ; जबी-ए-नाज=पांव से माथे तक
फशां-ओ-मह चुका=सूरज और चांद की तरह रोशनी फूट रही है |



Wednesday, December 22, 2010

ये इश्क नहीं आसां एक आग का दरिया है Yeh Ishq Nahi Aasan Aik Aag Ka Dariya Hai

वो  बोले 

ये  इश्क  नहीं  आसां , इतना  तो  समझ  लीजिये
एक  आग  का  दरिया  है , और  डूब  के  जाना  है

मैंने  कहा

 मासूम  सी  मोहब्बत  का  बस  इतना  सा   फ़साना  है
कागज  की  हवेली  है , बारिश  का  ज़माना  है

क्या  शर्त -ए -मोहब्बत  है , क्या  शर्त -ए -ज़माना  है 
आवाज़  भी  जख्मी  है  और  वो  गीत  भी  गाना  है

उस 
पार  उतरने  की  उम्मीद  बहुत  कम  है
कश्ती  भी  पुरानी  है , तूफ़ान  भी  आना  है

समझे  या  न  समझे  वो  अंदाज़ -ए -मोहब्बत  का
भीगी  हुई  आँखों  से  एक  शेर  सुनाना  है

भोली  सी  अदा , कोई  फिर  इश्क  की  जिद  पर  है
फिर  आग  का  दरिया  है  और  डूब  ही  जाना  है 

Saturday, November 6, 2010

शायद नहीं Shaayad Nahi

तुम्हारे चहरे के उल्लास को
चंचलता को
अतीत से खोज रही मेरी बूढ़ी आँखे
जिसमे भरे थे
 गुलमोहर के फूलों के चटक रंग
और तुम्हारे पास होने का अहसास
दबी-दबी सी मधुर आवाज
छुन-छुन करती धीमी सी हंसी
आज भी मेरे ठसा-ठस भरे दिल के
कोने में चिपकी पड़ी है
कच्चे गडारों वाले रास्ते
जो खेतों के बिच गहराते जा रहे हैं
बैलों की घंटियों की रूनझुन आवाज
मेरी जिन्दगी बाजरे के खनखनाते दानो सी
खुशियों से भरी थी
वो सब तुम्हरे आंचल में
तुम्हरी आँखों में मैंने देखा था
प्यार का सरमाया
क्या ऐसे प्यार के हमसफ़र खोजे जा सकते है
और क्या तुम्हरी देहगंध सी मदहोशी
कहीं और मिल पाएगी
शायद नहीं  
                               -इश्वर चंद्र सक्सेना

Thursday, October 28, 2010

एहसास Ehsas

तेरे  दुःख  और  दर्द  का  मुझपर   भी  हो  ऐसा  असर
तू  रहे  भूखा  तो , मुझसे  भी  न  खाया  जाए

तेरी   मंजिल  को  अगर  रास्ता  न  मै  दिखला  सकूँ
मुझसे  भी  मेरी  मंजिल , को  न  पाया  जाए

तेरे  तपते  शीश  को  गर ,छाँव  न  दिखला  सकूँ
मेरे  सर  की  छाँव  से ,सूरज  सहा  न  जाए

तेरे  अरमानो  को  गर  मै , पंख  न  लगाव  सकूँ
मेरी  आशाओं  के  पैरों  से  चला  न  जाये

तेरे  अंधियारे  घर  को  रोशन  अगर  न  कर  सकूँ
मेरे  आंगन  के  दिए  से  भी  जला  न  जाये

तेरे  घावों  को  अगर , मरहम  से  न  सहला  सकूँ
मेरे  नन्हे  जख्म  को  बरसों  भरा  न  जाए

आग  बुझती  है  यहाँ ,गंगा  में  भी  झेलम  में  भी
कोई  बतलाये  कहाँ , जाकर  नहाया  जाए