Sunday, August 14, 2011

ख़िरद मन्दो से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है Khirad mando se kya poochhoon ki meri ibtida kya hai.

Iqbal shayari in hindi
ख़िरद मन्दो  से  क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है
कि मैं इस फिक्र में रहता हूँ मेरी इन्तहा क्या है

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रिज़ा क्या है

नज़र आई  मुझे तक़दीर की गहराइयाँ इसमें
न पूछ ऐ हमनशी मुझसे वो चश्मे-सुर्मा-सा क्या है

नवाए-सुबह गाही ने जिगर खूँ कर दिया मेरा
खुदाया जिस खता की यह सज़ा है वो खता क्या है  

                                       - अल्लामा मुहम्मद 'इक़बाल'
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 ख़िरद=ज्ञानी ; इब्तिदा=आरंभ ; इन्तहा=अंत ; रिज़ा=भाग्य ; हमनशी=इच्छा ;
 चश्मे-सुर्मा=आँख का सुर्मा ; नवाए-सुबह=सुबह की आवाजें ; 

Friday, July 29, 2011

बे-खुदी ले गई कहाँ हम को Be-khudi le gayi kahaan ham ko

Meer Taqi Meer ke Nagme
बे-खुदी  ले  गई  कहाँ  हम  को
देर  से  इंतज़ार  है  अपना

रोते  फिरते  हैं  सारी-सारी  रात
अब  यही  रोज़गार  है  अपना

दे  के  दिल  हम  जो  हो  गए  मजबूर
इसमें  क्या  इख्तियार  है  अपना

कुछ  नहीं  हम  मिसाल-ए-उनका  ले  के
शहर-शहर  इश्तहार  है  अपना

जिसको  तुम  आसमान  कहते  हो
सौ   दिलों  का  गुबार  है  अपना
                                               -मीर तकी मीर

Sunday, July 3, 2011

हैराँ हूँ दिल को रोऊँ, के: पीटूँ जिगर को मैं ? HairaaN hoon dil ko ro'oon ki peetoon jigar ko main

हैराँ  हूँ  दिल  को   रोऊँ,  के:  पीटूँ  जिगर  को  मैं
मक़दूर  हो  तो  साथ  रखूँ  नोह: गार  को  मैं

छोड़ा  न:  रश्क   ने   के:  तेरे  घर  का  नाम  लूँ
हर  यक  से  पूछता   हूँ  के:  जाऊँ  किधर  को  मैं ?

जाना  पड़ा  रक़ीब  के  दर  पर  हज़ार  बार
ए  काश !  जानता  न:  तेरे  रहगुज़र  को  मैं

है  क्या  जो  कस  के  बाँधिए,  मेरी  बाला  डरे
क्या  जनता  नहीं  हूँ  तुम्हारी  कमर  को  मैं

लो  वो:  भी  कहते  हैं  के: ये:  बे  नंग-ओ-नाम  है
ये: जानता  अगर,  तो  लुटाता  न:  घर  को  मैं

चलता  हूँ  थोड़ी  दूर  हर  इक  तेज़रौ  के  साथ
पहचानता  नहीं  हूँ  अभी  राहबर  को  मैं

ख़्वाहिश  को  अहमक़ों  ने  परस्तिश  दिया  क़रार
क्या  पूजता  हूँ  उस  बूते  बेदादगर   को   मैं ?

फिर  बेखुदी  में  भूल  गया  राहे  कू-ए-यार
जाता  वगर्न: एक  दिन  अपनी  ख़बर  को  मैं

अपने  पे: कर  रहा  हूँ  कियास   अहले  दहर  का
समझा  हूँ   दिल पज़ीर   मताअ-ए-हुनर  को  मैं

ग़ालिब ! खुदा  करे  के:  सवारे  समन्दे  नाज़
देखूँ   अली  बहादुरे   आली  गुहर   को   मैं
                                               - मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ  'ग़ालिब'
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मक़दूर=सामर्थ्य;  नोह: गार=मातम करने वाला;  रश्क=इर्ष्या;  रक़ीब=प्रतिद्वंदी(दुसमन); रहगुज़र=मार्ग;
बे नंग-ओ-नाम=बद चलन;  तेज़रौ=तीव्रगामी(तेज़ चलने वाली);  राहबर=मार्ग दर्शक; परस्तिश=पूजना;
बूते  बेदादगर=मस्ती;  राहे  कू-ए-यार=प्रेमी की गली का मार्ग;  कियास=अनुमान;  अहले  दहर=दुनिया वाले;
दिल पज़ीर=मनोवांछित(मन मुताबित);  मताअ-ए-हुनर=कला की सम्पत्ति;  सवारे  समन्दे  नाज़=गर्व के
घोड़े पे सवार;  अली  बहादुरे=ग़ालिब का मित्र;   आली गुहर=अधिक मूल्यवान;

Tuesday, June 28, 2011

ये: न: थी हमारी क़िस्मत के विसाले यार होता Ye na thi hamari kismat ke visale yaar hota-Galib

Mirza Ghalib poetry in Hindi
ये:  न:  थी  हमारी  क़िस्मत  के  विसाले  यार  होता
अगर  और  जीते  रहते , यही   इंतज़ार  होता

तेरे  वादे  पर  जिए  हम , तो  ये:,  जान  झूठ  जाना
के  ख़ुशी  से  मर  न: जाते, अगर  एतिबार  होता

तेरी  नाजुकी  से  जाना  के: बँधा  था  अहद  बोदा
कभी  तू  न: तोड़  सकता, अगर  उस्तवार होता

कोई  मेरे  दिल  से  पूछे,  तेरे  तीरे नीमकश  को
ये  ख़लिश  कहाँ  से  होती,  जो  जिगर  के  पार होता

ये: कहाँ  की  दोस्ती  है  के:  बने  हैं  दोस्त,  नासेह
कोई  चारासाज़  होता,  कोई  ग़मगुसार  होता

रगे  संग  से  टपकता  वो: लहू  के: फिर  न:  थमता
जिसे  ग़म  समझ  रहे  हो,  ये:  अगर  शरार  होता

गम   अगर्चे  जाँगुसिल  है,  पे:  कहाँ  बचें  के: दिल है
गमे  इश्क  गर  न  होता,  गमे  रोज़गार   होता

कहूँ   किससे  मैं   के: क्या  है, शबे  ग़म  बुरी  बाला  है
मुझे  क्या  बुरा  था  मरना  अगर  एक  बार  होता

हुए  मर  के:  हम  जो  रुस्वा,  हुए  क्यूँ  न:  गर्के  दरिया
न:  कभी  जनाज़ा  उठता, न  कहीं  मज़ार  होता

उसे  कौन  देख  सकता  के:, यागन:  है  वो: यक्ता
जो  दुई  की  बू  भी  होती,  तो  कहीं  दुचार  होता

ये:  मसाइले  तसव्वुफ़ ,  ये  तेरा  बयान, ग़ालिब !
तुझे  हम  वली  समझते, जो  न:  बादः ख्वार  होता

                                                                                               -मिर्ज़ा असद-उल्लाह: खाँ  'ग़ालिब'

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विसाले=मिलन ;  अहद  बोदा=कच्ची प्रतिज्ञा ;  उस्तवार=पक्का ;  तीरे नीमकश=अध खींचा हुआ तीर ;
ख़लिश=चुभन ;  नासेह=एक या बहुत से आदमी ;  चारासाज़=उपचारक ;  ग़मगुसार=दुःख का साथी ;  रगे  संग=पत्थर की नस ;  शरार=चिंगारी ;  अगर्चे=यधपि,गोकि ;  जाँगुसिल=कष्टदायक ;
गमे  इश्क=प्रेम का संताप ;  गमे  रोज़गार=संसार की चिन्ता ;  शबे  ग़म=रात्रि का विरह(विरह=जुदाई का दर्द);
रुस्वा=बदनाम ;  गर्के  दरिया=दरिया में डूबना ;  यागन:=अलग ;  यक्ता=अकेला ;  दुई=झगड़ा ;
दुचार=सामने आना ;  मसाइले  तसव्वुफ़=ब्रहमवाद की समस्याएं ;   बादः ख्वार=शराबी ;

Saturday, June 4, 2011

अजब नशात से, जल्लाद के चले हैं हम आगे Ajab nashat se jallad ke chale hain hum aage-Galib

अजब  नशात  से, जल्लाद के चले  हैं  हम आगे
के: अपने साये से सर, पाँव से है दो कदम आगे

कज़ा  ने  था  मुझे  चाहा  ख़राबे  बादः-ए-उल्फ़त
फ़क़त  'ख़राब' लिखा, बस नः चल सका कलम आगे

ग़मे  ज़मानः ने  झाड़ी  नाश्ते  इश्क़  की मस्ती
वगर्न: हम भी उठाते थे लज्ज़ते  अलम  आगे

खुदा  के  वास्ते  दाद  इस जुनूने शौक़ की देना
के  उसके  दर  पे: पहोंचते हैं नामःबार से हम आगे

ये:  उम्र  भर  जो  परीशानियाँ  उठाई  हैं  हमने
तुम्हारे आइयो  ऐ  तुर्र: हाए ख़म  बः  ख़म, आगे

दिल-ओ-जिगर  में  परअफशाँ जो एक  मौज:-ए-खूँ  है
हम  अपने  ज़ओम में समझे हुए थे उसको दम आगे

क़सम  जनाज़े  पे: आने  की  मेरे  खाते  हैं  'ग़ालिब'
हमेशा: खाते  थे  जो  मेरी जान  की  क़सम, आगे 

                                        -मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ  'ग़ालिब'

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नशात=हर्ष;  कज़ा=मौत;  ख़राबे  बादः-ए-उल्फ़त=मदिरा की चाहत मे नष्ट;  ग़मे  ज़मानः=दुनिया के दुःख;
नाश्ते  इश्क़=प्रेम का हर्ष (खुसी);   लज्ज़ते  अलम=दुखों का आनंद;  नामःबार=डाकिया;  
तुर्र: हाए ख़म  बः  ख़म=घूँघरियली बालों की लटें;   परअफशाँ=व्याकुल (बेचैन);
    मौज:-ए-खूँ=खून की लहर;  ज़ओम=घमंड;   दम=सांस;           

Sunday, May 22, 2011

हुई ताखीर, तो कुछ बाइसे ताखीर भी था Hui takhir, Toh kuch baaise takhir bhi tha

हुई ताखीर, तो कुछ बाइसे ताखीर भी था
आप आते थे, मगर कोई इनाँगीर भी था

तुमसे बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला
उससे कुछ शाइब-ए-खूबी-ए-तकदीर भी था

तू मुझे भूल गया हो तो पता बतला दूं
कभी फ़ितराक में तेरे कोई नख्चीर भी था ?

कैद में है तेरे वहशी की वोही जुल्फ की याद
हाँ कुछ इक रंजे गराँ बारि-ए-जंजीर भी था

बिजली कोंद गई आँखों के आगे, तो क्या
बात करते, के: मैं लब तश्न:-ए-तक़रीर भी था

युसूफ उसको कहूँ और कुछ  न: कहे, ख़ैर हुई
गर बिगड़  बैठे, तो  मैं लायक़े तअज़ीर भी था

देखकर  गैर,  क्यों हो न: कलेजा ठंडा
नाल: करता था, वले तालिबे तासीर भी था

पेशे में ऐब नहीं, रखिए नः  'फरहाद' को  नाम
हम ही आशुफ़्ता सरों में वोः जवाँ  'मीर'  भी था

हम थे मरने को खड़े, पास नः आया, नः सही
आख़िर उस शोख़ के तरकश में कोई तीर भी था

पकडे जातें हैं फ़रिश्तों के लिखे पर नाहक
आदमी कोई हमारा दमे तहरीर भी था ?

रेख्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो  'ग़ालिब'
कहतें हैं, अगले ज़माने में कोई  'मीर' भी था  

                          -मिर्ज़ा असद-उल्लाः खाँ  'ग़ालिब'

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ताखीर=ढील,देर;  बाइसे=कारण;  बेजा=बिना कारण;  शाइब=मिलावट,शक;  खूबी-ए-तकदी=सौभाग्य;
फ़ितराक=शिकारी का थैला;  नख्चीर=शिकार किया हुआ जानवर;  वहशी=पागल;  बारि-ए-जंजीर=जंजीर
के बोझ का कष्ट;  कोंद=चमक देना;   तश्न:-ए-तक़रीर=प्यासे होटों की आवाज;  युसूफ=एक अवतार का
नाम जो अपनी सुन्दरता में प्रसिद्ध थे(यहाँ प्रेमी लिया गया है);  तअज़ीर=सजा के योग्य;  नाल:=रुदन(रोना)
तासीर=प्रभाव;  सरों=दीवानों,पागलों;  मीर=ग़ालिब से पूर्व एक प्रसिद्ध शायर का नाम;  सोख़=चंचल;



Monday, May 16, 2011

वो कहती है सुनो जानम मोहब्बत मोम का घर है Wo kahti hai suno janam mohabbat mom ka ghar hai

Famous shayari collection in Hindi
 वो  कहती  है  सुनो  जानम
मोहब्बत  मोम का  घर  है
तपिश ये बदगुमानी  की
कहीं  पिघला  न  दे  इस को

मैं  कहता  हूँ
जिस  दिल  मैं  ज़रा  भी   बदगुमानी   हो
वहाँ  कुछ  और  हो  तो   हो
मोहब्बत  हो  नहीं  सकती

वो  कहती  है  सदा  ऐसे  ही
क्या  तुम  मुझको  चाहो  गे
के  मैं  इस  में  कमी  बिलकुल
गवारा  कर  नहीं  सकती

मैं  कहता  हूँ
मोहब्बत  क्या  है
यह  तुम  ने  सिखाया  है
मुझे  तुम  से  मोहब्बत  के  सिवा
कुछ  भी  नहीं  आता

वो  कहती  है
जुदाई  से  बहुत  डरता  है  मेरा  दिल
के   खुद  को  तुम  से  हट  कर  देखना
मुमकिन  नहीं  है  अब

मैं  कहता  हूँ
यही  खद्शे  बहुत  मुझ  को  सतातें  हैं
मगर  सच  है  मोहब्बत  में
जुदाई  साथ  चलती  है

वो  कहती  है
बताओ  क्या  मेरे  बिन  जी  सको  गे  तुम
मेरी  बातें, मेरी  यादें, मेरी  ऑंखें
भुला  दो  गे

मैं  कहता  हूँ
कभी  इस   बात  पर  सोचा  नहीं  मैं ने
अगर  इक  पल  को  भी  सोचूँ   तो
साँसें  रुकने  लगती  हैं

वो  कहती  है  तुम्हें  मुझ से
मोहब्बत  इस  कदर  क्यों  है
के  मैं  इक  आम  सी  लड़की
तुम्हें  क्यों  खास  लगती  हूँ

मैं  कहता  हूँ
कभी  खुद  को  मेरी  आँखों  से  तुम  देखो
मेरी  दीवानगी  क्यों  है
ये   खुद  ही  जान  जाओ  गी

वो  कहती  है
मुझे  वारफ्तगी  से  देखते  क्यों  हो
के  मैं  खुद  को  बहुत
किमती  महसूस  करती  हूँ

मैं  कहता  हूँ
मता-ए-जां  बहुत अनमोल  होती  है
तुम्हें  जब  देखता  हूँ  जिन्दगी
महसूस  करता  हूँ

वो  कहती  है  मुझे अल्फाज़ के जुगनू  नहीं  मिलते
के  तुम्हें  बता  सकूं
के   दिल  में  मेरे
कितनी  मुहब्बत  है

मैं  कहता  हूँ
मुहब्बत  तो  निघाहों से  झलकती  है
तुम्हारी  खामोसी  मुझसे
तुम्हारी  बात  करती  हैं

वो  कहती  है
बताओ  न  किस  को  खोने  से  डरते  हो
बताओ  कौन  है  वो  जिसे
ये  मौसम  बुलातें  हैं

मैं कहता  हूँ
यह  मेरी  शाएरी  है  आइना  दिल  का
ज़रा  देखो  बताओ  क्या
तुम्हें  इस  में  नज़र  आया

वो  कहती  है
आतिफ  जी  बहुत  बातें  बनाते  हो
मगर  सच  है  ये  बातें
बहुत  ही  शाद  रखती  हैं

मैं  कहता  हूँ
यह  सब  बातें  ये  फशाने  इक  बहाना  है
के  पल  कुछ  जिंदगानी  के
तुम्हारे  साथ  कट  जाएँ

फिर  उस  के  बाद  ख़ामोशी  का
दिलकश  रक्स  होता  है
निगाहें   बोलती  है  और
लब  खामोश  रहते  हैं

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1 वारफ्तगी=खोया-खोयापन; 2 बदगुमानी=किसी की ओर से बुरा खयाल
3 खद्शे=डर; 4 मता-ए-जां=जान की कीमत; 5 शाद=खुश; 6 रक्स=नृत्य