Monday, May 9, 2011

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग (Mujhse pehli si mohabbat mere mehboob na maang)

मुझसे  पहली  सी   मोहब्बत  मेरे  महबूब   न  मांग

मैंने  समझा  था  के  तू   है  तो  दरख्शां  है  हय्यात
तेरा  ग़म   है  तो  शाम -ए-दहर  का  झगड़ा क्या  है

तेरी  सूरत  से  है  आलम  में  बहारों  को  सबात
तेरी  आँखों  के  सिवा दुनिया में  रखा  क्या  है

तू  जो  मिल  जाये  तो  तकदीर  निगूं  हो  जाये
यूँ  न  था  मैंने  फ़क़त  चाह  था  यूँ  हो  जाये

और  भी  दुःख  हैं  ज़माने  में  मोहब्बत  के  सिवा
राहतें और  भी  हैं  वस्ल  की  राहत  के  सिवा

मुझे  पहली  सी  मोहब्बत  मेरे  महबूब  न  मांग

अनगिनत  सदियों  के  तारिक  बहिमाना  तलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख्वाब  में  बुनवाये  हुए

जा-ब-जा  बिकते  हुए  कूचा-ओ-बाज़ार  में  जिस्म
ख़ाक  में  लिथरे हुए , खून  में  नेहलाए  हुए

जिस्म  निकले  हुए  अमराज़  के  तन्नूरों  से
पीप  बहती   हुई  जलते  हुए   नासूरों  से

लौट  जाती  है  उधर  को  भी  नज़र  क्या  की  जिए
अब  भी  दिलकश  है  तेरा  हुस्न  मगर  क्या  की  जिए

और  भी  दुःख  हैं  मोहब्बत  के  दुःख  के  सिवा
राहतें और  भी  हैं  वस्ल  की  राहत  के  सिवा

मुझसे  पहली  सी  मोहब्बत  मेरे   महबूब  न  मांग
                                                                       -फैज़

Friday, March 25, 2011

हुस्न भी था उदास HUSSAN BHI THA UDAS

हुस्न भी था उदास,उदास ,शाम भी थी धुआं-धुआं  ,
याद सी आके रह गयी दिल को कई कहानियां |

छेड़ के दास्तान-ए-गम अहले वतन के दरमियाँ ,
हम अभी बीच में थे और बदल गई ज़बां |

सरहद-ए-ग़ैब तक तुझे साफ मिलेंगे नक्श-ए-पा ,
पूछना यह फिरा हूं मैं तेरे लिए कहां- कहां |

रंग जमा के उठ गई कितने तमददुनो की बज्म ,
याद नहीं ज़मीन को , भूल गया है आसमां |

जिसको भी देखिए वहीँ बज़्म में है गज़ल सरा,
छिड़ गयी दास्तान-ए-दिल बहदीस-ए-दीगरा |

बीत गए है लाख जुग सूये वतन चले हुए ,
पहुंची है आदमी की ज़ात चार कदम कशां-कशां |

जैसे से खिला हुआ गुलाब चांद के पास लहलहाए
रात वह दस्त-ए-नाज़ में जाम-ए-निशात-ए-अरगवां |

मुझको फिराक़ याद है पैकर-ए-रंग-ओ-बूए दोस्त ,
पांव से ता जबी-ए-नाज , मेहर फशां-ओ-मह चुका |
                                                                -फ़िराक़ गोरखपुरी
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अहले वतन=देशवासी ; सरहद-ए-ग़ैब=अज्ञात सीमा ;
नक्श-ए-पा=पांव के निशान ; तमददुनो=सभ्यताओं ;
सरा=गायक ; बहदीस-ए-दीगरा=दूसरों की बातों के साथ
सूये=तरफ,ओर ;  कशां-कशां=खिंचे-खिंचे ;दस्त-ए-नाज़=नाजुक हाथ;
जाम-ए-निशात-ए-अरगवां=उनके हाथों में शराब क जाम बिकुल ऐसे
ही है जी चांद के पास खिला हुआ गुलाब ; पैकर-ए-रंग-ओ-बूए दोस्त=
महबूब की छवि-रंग और सुगंध ; जबी-ए-नाज=पांव से माथे तक
फशां-ओ-मह चुका=सूरज और चांद की तरह रोशनी फूट रही है |



Saturday, February 26, 2011

चाँद तनहा है Chand Tanha Hai

Best Poetry Collection in Hindi
 चाँद  तनहा  है  आसमान  तनहा
दिल  मिला  है  कहाँ  कहाँ  तनहा

बुझ  गयी  आस  छुप  गया  तारा
थर  थराता  रहा  धुआं  तनहा

ज़िन्दगी  क्या  इसी  को  कहते  हैं
जिस्म  तनहा  है  और  जां  तनहा

हमसफ़र  कोई  गर  मिले  भी  कहीं
दोनों  चलते  रहे  तनहा  तनहा

जलती  बुझती  सी  रोशनी  के  परे
सिमटा  सिमटा  सा  एक  मकां तनहा

राह  देखा  करेगा  सदियों  तक
छोड़  जायेंगे  ये  जहां  तनहा
              
                                                      -मीना कुमारी

Wednesday, December 22, 2010

ये इश्क नहीं आसां एक आग का दरिया है Yeh Ishq Nahi Aasan Aik Aag Ka Dariya Hai

वो  बोले 

ये  इश्क  नहीं  आसां , इतना  तो  समझ  लीजिये
एक  आग  का  दरिया  है , और  डूब  के  जाना  है

मैंने  कहा

 मासूम  सी  मोहब्बत  का  बस  इतना  सा   फ़साना  है
कागज  की  हवेली  है , बारिश  का  ज़माना  है

क्या  शर्त -ए -मोहब्बत  है , क्या  शर्त -ए -ज़माना  है 
आवाज़  भी  जख्मी  है  और  वो  गीत  भी  गाना  है

उस 
पार  उतरने  की  उम्मीद  बहुत  कम  है
कश्ती  भी  पुरानी  है , तूफ़ान  भी  आना  है

समझे  या  न  समझे  वो  अंदाज़ -ए -मोहब्बत  का
भीगी  हुई  आँखों  से  एक  शेर  सुनाना  है

भोली  सी  अदा , कोई  फिर  इश्क  की  जिद  पर  है
फिर  आग  का  दरिया  है  और  डूब  ही  जाना  है 

Friday, December 3, 2010

हमारी हर कहानी में तुम्हार नाम आता है Hamaari Har Kahaani Mein Tumhara Naam Aataa Hai

हमारी हर कहानी में तुम्हार नाम आता है
ये कैसे सबको समझाएं कि तुमसे कैसा नाता है

न जाने चाँद पूनम का ये क्या जादू चलाता है
कि पागल हो रहीं लहरें समंदर कशमकाता है
जरा सी परवरिश भी चाहिए हर एक रिशते को
अगर सींचा नहीं जाए तो पौधा सूख जाता है

हमारी हर कहानी में तुम्हार नाम आता है
ये कैसे सबको समझाएं कि तुमसे कैसा नाता है

ये मेरे और गम के बीच में किस्सा है वर्षों से
में उसको आजमाता हूँ वो मुझको आजमाता है
जिसे चींटी से लेकर चाँद , सूरज सभी सिखाया था
वही बेटा बड़ाहोकर सबक मुझको पढाता है
नहीं है बेई मानी गर ये बादल की तो फिर क्या है
मरूस्थल छोड़कर जाने कहाँ पानी गिरता है     

हमारी हर कहानी में तुम्हार नाम आता है
ये कैसे सबको समझाएं कि तुमसे कैसा नाता है

ख़ुदा का खेल ये अबतक नहीं समझे के वो हमको
बना कर क्यों मिटाता है , मिटा कर क्यों बनाता है
वो बर्षों बाद आकर कह गया फिर जल्दी आने को
पता माँ बाप को भी है वो कितनी जल्दी आता है

हमारी हर कहानी में तुम्हार नाम आता है
ये कैसे सबको समझाएं कि तुमसे कैसा नाता है

Saturday, November 6, 2010

हम दीवानों की क्या हस्ती Ham Deewanon ki kya Hasti

हम दीवानों की क्या हस्ती
है आज यहाँ , कल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चला
हम धुल उड़ाते जहाँ चले
              आए बनकर उल्लास अभी
              आंसू बनकर बह चले अभी
सब कहते ही रह गए , अरे
तुम कैसे आए , कहाँ चले !
किस ओर चले ? यह मत पूछो
चलना है , बस इसलिए चले
जग से उसका कुछ लिए चले
जग को अपना कुछ दिए चले
              दो बात कही दो बात सुनी !
              कुछ हंसे और फिर कुछ रोए !
छककर सुख-दुःख के घूँटों को
हम एक भाव से पिए चले !
              हम भिखमंगों की दुनिया में
              स्वच्छंद लुटाकर प्यार चले
              हम एक निशानी-सी उर पर
              ले असफलता का भर चले
हम मान रहित , अपमान रहित
जी भरकर खुलकर खेल चुके
              हम हँसते-हँसते आज यहाँ
              प्राणों की बाजी हार चले !
हम भला बुरा सब भूल चुके
नत मस्तक हो मुख मोड़ चले
अभिशाप उठा कर होंठों पर
वरदान दृगों पर छोड़ चले
               अब अपना क्या पराया क्या ?
               आबाद रहें रुकने वाले !
हम स्वयंम बँधे थे और स्वयंम
हम अपने बंधन तोड़ चले !
    

शायद नहीं Shaayad Nahi

तुम्हारे चहरे के उल्लास को
चंचलता को
अतीत से खोज रही मेरी बूढ़ी आँखे
जिसमे भरे थे
 गुलमोहर के फूलों के चटक रंग
और तुम्हारे पास होने का अहसास
दबी-दबी सी मधुर आवाज
छुन-छुन करती धीमी सी हंसी
आज भी मेरे ठसा-ठस भरे दिल के
कोने में चिपकी पड़ी है
कच्चे गडारों वाले रास्ते
जो खेतों के बिच गहराते जा रहे हैं
बैलों की घंटियों की रूनझुन आवाज
मेरी जिन्दगी बाजरे के खनखनाते दानो सी
खुशियों से भरी थी
वो सब तुम्हरे आंचल में
तुम्हरी आँखों में मैंने देखा था
प्यार का सरमाया
क्या ऐसे प्यार के हमसफ़र खोजे जा सकते है
और क्या तुम्हरी देहगंध सी मदहोशी
कहीं और मिल पाएगी
शायद नहीं  
                               -इश्वर चंद्र सक्सेना