Monday, October 24, 2011

बाज़ीचः-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे Bazeecha e Atfal Hai Duniya Mere Aage - Mirza Ghalib

बाज़ीचः-ए-अत्फ़ाल  है दुनिया मेरे आगे होता है  शब-ओ-रोज़  तमाशा मेरे आगे इक खेल है औरंगे-ए-सुलेमाँ मेरे नज़दीक इक बात है  एजाज़े मसीहा मेरे आगे जुज़ नाम, नहीं सूरते आलम मुझे मंजूर जुज़ वहम  नहीं, हस्ति-ए-आशिया मेरे आगे होता है निहाँ  गर्द में सहरा, मेरे होते घिसता है जबीं ख़ाक पे: दरिया मेरे आगे मत पूछ के क्या हाल है मेरा तेरे पीछे तू  देख  के: क्या रंग ...

Monday, October 10, 2011

ज़िक्र उस परीवश का, और फिर बयाँ अपना Jikra us parivash ka aur fir bayaan apna

ज़िक्र  उस  परीवश  का, और  फिर  बयाँ  अपना बन  गया  रक़ीब  आखिर,  था  जो  राज़दाँ  अपना मय  वो:  क्यूँ  बहुत  पीते  बज़्मे  ग़ैर  में  यारब ! आज  ही  हुआ  मंजूर  उन  को  इम्तिहाँ  अपना मंज़र  इक  बुलन्दी  पर  और  हम  बना  सकते अर्श ...