वो बोले
ये इश्क नहीं आसां , इतना तो समझ लीजिये
एक आग का दरिया है , और डूब के जाना है
मैंने कहा
मासूम सी मोहब्बत का बस इतना सा फ़साना है
कागज की हवेली है , बारिश का ज़माना है
क्या शर्त -ए -मोहब्बत ...
Wednesday, December 22, 2010
Friday, December 3, 2010
हमारी हर कहानी में तुम्हार नाम आता है Hamaari Har Kahaani Mein Tumhara Naam Aataa Hai
हमारी हर कहानी में तुम्हार नाम आता है
ये कैसे सबको समझाएं कि तुमसे कैसा नाता है
न जाने चाँद पूनम का ये क्या जादू चलाता है
कि पागल हो रहीं लहरें समंदर कशमकाता है
जरा सी परवरिश भी चाहिए हर एक रिशते को
अगर सींचा नहीं जाए तो पौधा सूख जाता है
हमारी हर कहानी में तुम्हार नाम आता है
ये कैसे सबको समझाएं कि तुमसे कैसा नाता है
ये मेरे और गम के बीच में किस्सा है वर्षों से
में उसको आजमाता हूँ वो मुझको आजमाता...
Saturday, November 6, 2010
शायद नहीं Shaayad Nahi
तुम्हारे चहरे के उल्लास को
चंचलता को
अतीत से खोज रही मेरी बूढ़ी आँखे
जिसमे भरे थे
गुलमोहर के फूलों के चटक रंग
और तुम्हारे पास होने का अहसास
दबी-दबी सी मधुर आवाज
छुन-छुन करती धीमी सी हंसी
आज भी मेरे ठसा-ठस भरे दिल के
कोने में चिपकी पड़ी है
कच्चे गडारों वाले रास्ते
जो खेतों के बिच गहराते जा रहे हैं
बैलों की घंटियों की रूनझुन आवाज
मेरी जिन्दगी बाजरे के खनखनाते दानो सी
खुशियों से भरी थी
वो सब तुम्हरे...
Thursday, October 28, 2010
Wednesday, October 27, 2010
हर एक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है Har Ek Baat Pe Kahte Ho Tum ke Tu Kya Hai
हर एक बात पे कहते हो तुम, के तू क्या है
तुम्ही कहो के ये अंदाजे गुफ्तगू क्या है
न शोले में ये करिश्म न बर्क में ये अदा
कोई बताओ के वो शोखे तन्द्खु क्या है
ये रश्क है के वो होता है हमसुखन तुमसे
वगर्न खौफे बदआमोजी -ए-अदू क्या है
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारे जैब को अब हाजते रफू क्या है
जलता है जिस्म जहाँ, दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब रख, जुस्तजू क्या है
रगों में दौड़ते...
Tuesday, October 26, 2010
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते है ye hum jo hijr mein diwar-o-dar ko dekhte hain
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैकभी सबा को कभी नामःबार को देखते हैवो आए घर में हमारे,खुदा की कुदरत हैकभी हम उनको,कभी अपने घर को देखते हैनज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाजू कोये लोग क्यूं मेरे ज़ख़्म जिगर को देखते हैतेरे जवाहिरे तर्फे कुल को क्या देखेंहम औजे तअले लाल-ओ-गुहार को देखते हैजहाँ तेरा नक़्शे कदम देखते हैखियाबां-खियाबां इरम देखते हैदिल अशुफ्तगां खाले कुंजे दहन केसुवैदा में सैरे अदम देखते...
Monday, October 25, 2010
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक Aah ko chahiye ek umr asar hone tak
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तककौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तकदामें हर मौज में है हल्क-ए-सदकामे निहंगदेखें क्या गुजरे है कतरे पे गुहर होने तकआशिकी सब्र तलब और तम्मना बेताबदिल का क्या रंग करूँ खूने जिगर होने तकहमने माना के तगाफुल न करोगे,लेकिनखाख हो जाएँगे हम,तुमको खबर होने तकपरतवे खूर से है सबनम को फ़ना की तअलीममें भी हूँ एक इनायत की नजर होने तकयक नज़र बेश नहीं फुर्सते हस्ती गाफ़िलगर्मि-ए-बज़्म...
Sunday, October 24, 2010
हुस्ने मह गरचे ब हंगामें कमाल अच्छा है Husne mah garche ba hangame kamaal achha hai
हुस्ने मह गरचे ब हंगामें कमाल अच्छा हैउससे मेरा माहे खुरशीद जमाल अच्छा हैबोस देते नहीं और दिल पे है हर लहज निगाहजी में कहते हैं के मुफ्त आए तो माल अच्छा हैऔर बाजार से ले आए,अगर टूट गयासागरे जम से मेरा जामे सिफाल अच्छा हैबेतलब दें तो मजा उसमें सिवा मिलता हैवो गदा, जिसको न हो खूं-ए-सवाल, अच्छा हैउनके देखे से आ जाती है मुँह पर रौनकवो समझते है के बीमार का हाल अच्छा हैदेखिए,पाते हैं उशशाक...
इब्ने मरियम हुआ करे कोई Ibne Mariam Hua Kare koi
इब्ने मरियम हुआ करे कोई
मेरे दुख की दावा करे कोई
शर्र-ओ-आईन पर मदार शाही
ऐसे कातिल का क्या करे कोई
चाल जैसे कड़ी कमाँ का तीर
दिल में ऐसे के जा करे कोई
बात पर वाँ जबान कटती है
वो कहें और सुना करे कोई
बक रहा हूँ जुनूँ में क्या-क्या कुछ
कुछ न समझे खुदा करे कोई
न सुनो, गर बुरा कहे कोई
न कहो, गर बुरा करे कोई
रोक लो,गर गलत चले कोई
बख्श दो,गर खता करे कोई
कौन है जो नहीं है हाजतमंद ?
किसकी हाजत रवा...
नुक्तः चीं है, गम-ऐ-दिल उसको सुनाए न बने Nukta chin hai gham-e-dil usko sunae na bane
नुक्तः चीं है, गम-ऐ-दिल उसको सुनाए न बनेक्या बने बात,जहाँ बात बनाए न बनेमैं बुलाता तो हूँ उसको मगर ऐ जज्ब-ए-दिल !उस पे बन जाए कुछ ऐसी के बिन आए न बनेखेल समझता है, कहीं छोड़ न दे,भूल न जाएकाश ! यूं भी हो के बिन मेरे सताए न बनेगैर फिरता है लिए यूं तेरे ख़त को,के अगरकोई पूछे के ये क्या है तो छुपाए न बनेइस नजाकत का बुरा हो,वो भले हैं तो क्याहाथ आएं, तो उन्हें हाथ लगाए न बनेकह सके कौन के ये जल्वःगरी...
Sunday, October 17, 2010
हज़ारों खाव्हिशें ऐसी, की हर ख्वाहिश पे दम निकले Hazaaron Khwaishein Aisi Ki Har Khwaish Pe Dam Nikle
हज़ारों खाव्हिशें ऐसी, की हर ख्वाहिश पे दम निकलेबहुत निकले मेरे अरमान,लेकिन फिर भी कम निकलेडरे क्यों मेरा कातिल,क्या रहेगा उसकी गर्दन परवो खूं जो चश्मे-तेर-से उम्र-भर यूं दम-ब-दम निकलेनिकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिनबहुत बे आबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकलेभरम खुल जाए ज़ालिम तेरे कामत की दराजी काअगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेचोख़म का पेचोख़म निकलेमगर लिखवाए कोई उसको ख़त,तो हमसे लिखवाएहुई सुबह और...