Friday, March 25, 2011

हुस्न भी था उदास HUSSAN BHI THA UDAS

हुस्न भी था उदास,उदास ,शाम भी थी धुआं-धुआं  ,
याद सी आके रह गयी दिल को कई कहानियां |

छेड़ के दास्तान-ए-गम अहले वतन के दरमियाँ ,
हम अभी बीच में थे और बदल गई ज़बां |

सरहद-ए-ग़ैब तक तुझे साफ मिलेंगे नक्श-ए-पा ,
पूछना यह फिरा हूं मैं तेरे लिए कहां- कहां |

रंग जमा के उठ गई कितने तमददुनो की बज्म ,
याद नहीं ज़मीन को , भूल गया है आसमां |

जिसको भी देखिए वहीँ बज़्म में है गज़ल सरा,
छिड़ गयी दास्तान-ए-दिल बहदीस-ए-दीगरा |

बीत गए है लाख जुग सूये वतन चले हुए ,
पहुंची है आदमी की ज़ात चार कदम कशां-कशां |

जैसे से खिला हुआ गुलाब चांद के पास लहलहाए
रात वह दस्त-ए-नाज़ में जाम-ए-निशात-ए-अरगवां |

मुझको फिराक़ याद है पैकर-ए-रंग-ओ-बूए दोस्त ,
पांव से ता जबी-ए-नाज , मेहर फशां-ओ-मह चुका |
                                                                -फ़िराक़ गोरखपुरी
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अहले वतन=देशवासी ; सरहद-ए-ग़ैब=अज्ञात सीमा ;
नक्श-ए-पा=पांव के निशान ; तमददुनो=सभ्यताओं ;
सरा=गायक ; बहदीस-ए-दीगरा=दूसरों की बातों के साथ
सूये=तरफ,ओर ;  कशां-कशां=खिंचे-खिंचे ;दस्त-ए-नाज़=नाजुक हाथ;
जाम-ए-निशात-ए-अरगवां=उनके हाथों में शराब क जाम बिकुल ऐसे
ही है जी चांद के पास खिला हुआ गुलाब ; पैकर-ए-रंग-ओ-बूए दोस्त=
महबूब की छवि-रंग और सुगंध ; जबी-ए-नाज=पांव से माथे तक
फशां-ओ-मह चुका=सूरज और चांद की तरह रोशनी फूट रही है |



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